हिन्दी में आदिवासी लेखन का परिदृश्य

संस्कृत के काव्यशास्त्रीय प्रतिमानों से होते हुए मुक्त छंद में रच बस चुकी हिन्दी कविता आज भी अपने कला-रूप  को लंेकर सजग है। आज भी दलित लेखकों की प्रभावी कविता को वह जगह नहीं मिली जिसकी वह हकदार है। बिम्ब, प्रतीक, वाग्मिता, छंद-लय की माँग आज भी हिन्दी  कविता में अपेक्षित है। किन्तु हिन्दी के वर्तमान पर विमर्शात्मक विविध स्वरों की दस्तक हो चुकी है। दलित चिंतन को आधार बनाकर लिखने वाले कवियों ने स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व को अपने सौन्दर्यशास्त्र का आधार माना है। उनके कथन का तेवर हिन्दी में अपना स्थान स्वतः बना रहा है। दूसरी ओर आदिवासी जीवन दर्शन की आवाज झारखंड  के आदिवासी कवियों की हिन्दी में सशक्त उपस्थिति  द्वारा सुनी  जा सकती है। इनका शिल्प या कला रूप वक्रोक्ति रहित  अत्यंत सरल है तो इनके मिथक, बिम्ब, प्रतीक भी सर्वथा नए हैं। सरल स्वभावी आदिम संस्कृति के इन वाहकों की कहनशैली अत्यंत सीधी है। उनमें आदिवासी अस्मिता की चिंताएँ इतनी गहन है कि वे जल्दी से जल्दी पुरातन वाचिक भंगिमा के अनुसार लेखन में भी अपनी बेचैनी को अभिव्यक्त कर देना चाहते हैं। यह कहन सर्वथा नया व भिन्न है किन्तु सपाट नहीं। उनमें अपनी वाचिक परम्परा की स्वाभाविक अन्तर्लय व गेयता है। आदिवासी वाचिक साहित्य बिना किसी लिखित आधार के सदियों से हस्तांतरित  होता रहा है जो उसकी जीवंतता का परिचायक है। अतः उनकी कहन शैली  के भिन्न रूप को काव्यशास्त्रीय प्रतिमानों के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। सामान्यतः हिन्दी में कविता को प्रत्यक्ष नहीं परोक्ष की विधा माना जाता है। जबकि आदिवासी कविता व पुरखा सािहत्य में प्रत्यक्ष की प्रधानता है।  हिन्दी  के परिदृश्य में विविध सांस्कृतिक, जातीय भूमि के नवागत दस्तक दे रहे हैं। उसका वर्तमान शिल्प या रूप का नहीं, अन्तर्वस्तु  और कथन का है। इन कथनों को उदारतापूर्वक और हिन्दी की लोकतांत्रिकता के निर्वाह के लिए सुना जाना आवश्यक है। नवजागरण की काव्यभूमि से लेकर छायावादी, प्रगतिवादी, नयी कविता, अकविता, बीटनिक, सातवे आठवें दशक और लांग नाइटीज़  तक आधुनिक हिन्दी कविता ने ग्रामीण, कस्बाई और शहरी मनोभूमि  की अन्तध्र्वनि को हिन्दी कविता के रूप में सुना है। इसमें जंगल के आदिम स्वर अदृश्य रहे हैं। हिन्दी  की वर्तमान कविता उपेक्षितों, वंचितों, शोषितों  की स्वानुभूति  का स्वतंत्र, मौलिक और भिन्न कला रूप व वस्तु लेकर उपस्थित है।

यद्यपि आदिवासी कविता का मौलिक रूप उनकी वाचिक परम्परा और भाषा में ही देखा जा सकता हैं। किन्तु हिन्दी में लिखी जा रही आदिवासी  कवियों की उपस्थिति  में उनकी विरासत और विस्थापन का द्वन्द्व किस सीमा तक और किस रूप में उपस्थित है, यह देखा जाना है। उनकी मूल भाषा मुंडारी, हो, नगपुरिया, खड़िया, संताली, कुडुख ही नहीं मध्य भारत की गोंड, कोरकू, भीली से लेकर पूर्वोत्तरीय या धुर दक्षिण तक अलग-अलग है। संभव है कि इन सभी आदिवासी स्वरों की संस्कृति व विरासत में कुछ अंतर हो। उदारीकरण, विस्तारीकरण  के फलस्वरूप  जो आदिवासी समुदाय अपने मूल स्थान से विच्छिन्न, विस्थापित हो शहर, कस्बे में आ बसे हैं, उनका स्वर अपनी भाषा के अतिरिक्त अब मूल रूप से हिन्दी में भी प्रस्तुत हो रहा है। वर्तमान हिन्दी कविता में सामान्यतः उनकी समृद्ध  सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन से उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक समस्याएँ, भिन्न मिथक, बिम्ब, विद्रोही चरित्रों – तिलका मांझी, बिरसा मुंडा, सिदो कान्हू आदि उपेक्षितों की स्मृति के साथ-साथ सम्पूर्ण सृष्टि को केन्द्र  में रखने वाली आदिवासी जीवन दर्शन की झलक देखने को मिलती है। यद्यपि हिन्दी में यह उनका पदार्पण है, उनकी वास्तविक परम्परा उनकी वाचिकता में उपस्थित है जिसका संकलन, संग्रहण भी किया जा रहा है। पर हिन्दी साहित्य की संवेदना में आदिम संस्कृति का यह स्वर उदारतापूर्वक सुना जाए, यह जरूरी है। आदिवासी वाचिक साहित्य की जीवंत व समृद्ध गीत परम्परा की विरासत उनकी हिन्दी में उपस्थिति  को भी समझने में सहयोग दे सकती है। साथ ही इससे आदिवासी कविता को देखने की एक नयी भूमि तैयार होती है। रामदयाल मुंडा की कई कविताएँ गीत रूप में प्रस्तुत हुई  हैं, जो उनका स्वाभाविक व मौलिक शिल्प  है। वक्रोक्ति की जगह सरल -सीधी, अभिव्यक्ति आदिवासी मानस की सरलता का द्योतक है।  इसी कारण उनकी अभिव्यक्ति शास्त्रीय  या विशिष्ट नहीं, सामूहिक  मन की सहज अभिव्यक्ति हैं उनका मौलिक साहित्य भी विशिष्ट और लोक में बँटा हुआ नहीं है। उनकी अपनी सहज कथन भंगिमा है। जो कव्यशास्त्रीय साँचे के अनुरूप निर्मित  नहीं होती । दरअसल हमारा शास्त्रीय लेखन व बोलियों की लोक परंपरा हिन्दू सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था की मानसिकता को लेकर चलता है, जिसके अधिकांश मिथक हिन्दू धर्म के हैं। लोक साहित्य में जरूर कुछ स्थानीयता के अनुरूप भिन्नता है। फिर भी वे एक जानी पहचानी सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था  से आते हैं। जबकि आदिवासी समाज हिन्दू सामाजिक संरचना का अंग नहीं हैं। उनकी संस्कृति, आस्था, विश्वास, दर्शन, जीवनशैली सर्वथा भिन्न है। इसी कारण उनके साहित्य की छवियाँ कथन, शिल्प, वस्तु पूर्णतः अलग है। इनका आकलन वैचारिक  निष्पक्षता व पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ही संभव है। वस्तुतः पूरे देश के आदिवासी समुदायों की उनकी स्वयं की भाषा मंे कहा गया  मौलिक साहित्य ही उनका वास्तविक, मौलिक  कथन है। हिन्दी  में प्रस्तुत आदिवासी कविता को इस आदिवासी दर्शन की पृष्ठभूमि  में ही समझा जाना उचित है।

जिस तरह दलित लेखन की सशक्त उपस्थिति आत्मकथा विधा में हुई है, उसी तरह आदिवासी लेखन की प्रभावी उपस्थिति  काव्य क्षेत्र में हुई है। अनुज लुगुन और जसिंता केरकेट्टा का काव्य  इनकी सर्वाधिक  परिपक्व व समर्थ उपस्थिति  के रूप में सम्मुख आया है। अतीत की विरासत और वर्तमान के अन्तद्र्वन्द्व के द्वैत को अनुज लुगुन ने कुशलता से साधा है। किन्तु ये हिन्दी के वर्तमान पीढ़ी के आदिवासी कवि हैं । वंदना  टेटे मानती हैं कि सुशीला सामद हिन्दी आदिवासी कविता की प्रथम कड़ी हैं, जिन्होंने ‘प्रलाप’ (1935)  और ‘सपने का संसार’   (1948)  जैसे दो काव्य संग्रह हिन्दी को दिए, जिसका हिन्दी के इतिहास में कहीं भी उल्लेख न होना, उनके अनुसार हिन्दी जगत की अलोकतांत्रिकता ही है। यहाँ उनका आक्रोश उचित भी है, जिसे सुना जाना जरूरी है।  वे कहती है, – ‘‘1930 के दशक में, जब हिन्दी और आधुनिक हिन्दी कविता अपने बचपने में ही थे, झारखंड के सुदूर इलाके चाईबासा में सुशीला  सामद हिन्दी कविताएँ लिख रही थीं। इस दौर में हिन्दी  के पटल पर कविता के क्षेत्र में गिनी चुनी कवयित्रियों  की ही उपस्थिति  थी। इसलिए अगर इस आदिवासी कवयित्री का जिक्र हिन्दी  के साहित्यिक इतिहास  में नहीं है, तो यह अजाने होने के कारण नहीं है, बल्कि जानबूझकर उन्हें उपेक्षित किया गया है। ऐसा मैं इस वास्ते भी कह रही हूँ क्योंकि सुशीला मात्र कविताएँ नहीं लिख रही हैं, बल्कि वे एक साहित्यिक – सामाजिक पत्रिका ‘चाँदनी’   का संपादन – प्रकाशन  भी कर रही थीं और तत्कालीन बिहार में गांधी की एकमात्र आदिवासी महिला ‘सुराजी’  आंदोलनकत्र्ता  भी थीं।   वे बिहार विधान परिषद में एम.एल.सी. भी रहीं  और सामाजिक – सांस्कृतिक, साहित्यिक के साथ-साथ अनेक वैधानिक दायित्वों  का निर्वाह भी सुसंगठित तरीके से किया ।  इन ऐतिहासिक तथ्यों   के आलोक में सुशीला झारखंड  के जंगलों में रह रही कोई अनाम और गुमनाम शख्सियत नहीं थीं। वह एक जानी मानी और राष्ट्रीय पटल पर अपनी पुख्ता पहचान रखने वाली, सामाजिक- साहित्यिक सरोकार ओर राष्ट्रीय आंदोलन  में जुझारू दखल रखने वाली बहुचर्चित आदिवासी महिला नेत्री थी।’’1 सुशीला सामद की काव्यशैली  पर छायावाद का प्रभाव था । ‘सरस्वती’ के संपादक देवीदत्त शुक्ल  द्वारा प्रशंसित होकर भी हिन्दी साहित्य एक आदिवासी कवयित्री की उपस्थिति को अनदेखा करता है, यह नाराजगी वंदना टेटे के स्वर  में स्पष्ट रूप से मिलती है। किन्तु  एक बात का स्पष्ट  संकेत भी मिलता है एक आदिवासी कवि के रूप में उपस्थित होने के बावजूद सुशीला सामद का काव्य आदिवासी काव्यशैली व वस्तु के अनुकूल न होकर छायावादी प्रभाव से ग्रस्त था।

आदिवासी कविता को देखने के लिए यदि उनके मौलिक वाचिक काव्य पर दृष्टिपात किया जाए तो एक बात स्पष्ट  रूप से सम्मुख  आती है कि आदिवासी काव्य परम्परा वस्तुतः  गीत परम्परा है। ऐसे गीत जो सामूहिक मन की अभिव्यक्ति होने के कारण संक्षिप्त, पुनरूक्ति या आवृत्तियुक्त तथा लय, राग  संगीत व गेयता से पूर्ण हैं। आदिवासी काव्य का पुरखा रूप सीधा, सरल और सपाट है। चूँकि यह सामूहिक मन की अभिव्यक्ति है जो समूह को ही संबोधित है अतः  यहाँ व्यंजना, अलंकृति और वक्रता नहीं है। ये काव्य -गीत संक्षिप्त आकार में है जिनमें  सामान्यतः दीर्घता नहीं पाई जाती।  लोकमानस, उत्सव, पर्व, संस्कार, प्रकृति, प्रेम, संवेग, दैनंदिन का जीवन कर्म और जीवन मूल्य प्रायः इनके विषय रहे हैं। सामान्यतः हिन्दी कविता मंे व्यंजना, वक्रोक्ति, बिम्बधर्मिता, लय पर अधिक जोर दिया जाता है। आदिवासी कविता की मूल प्रकृति भिन्न तरह की है। हिन्दी कविता में व्यक्ति का  मन सामाजिक सरोकारों से जुड़कर  विशिष्ट हो जाता है जबकि आदिवासी कविता में व्यक्ति केन्द्र में है ही नहीं। उसके मूल में ही समूह मन है फलतः समूह मन का काव्य रूप भी भिन्न अर्थात् सीधा सरल, स्पष्ट होना तय है। ‘‘काव्यानुभूति की सामूहिकता से  यहाँ जनजातीय कविता की लय रागबद्धता का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध  है। क्रिस्टोफर काॅडवेल ने ‘भ्रांति और यथार्थ’  (इल्युज़न एंड रियलिटी) में आज की कविता में छंद के बढ़ते  हुए हृास और मुक्त  छंद की बढ़ती हुई लोकप्रियता पर विचार करते हुए यह कहा है कि यह हृासोन्मुखी पूँजीवादी व्यवस्था  में व्यक्ति और समाज के बढ़ते हुए संबंध-विच्छेद का प्रतिफलन है। जिस समाज में व्यक्ति और समुदाय का सामंजस्य रहता है, उस समाज की कविता छंदबद्ध होती है। अभिप्राय  यह कि जीवन की लय ही कविता की लय हुआ करती है। इस विचार सूत्र को तार्किक परिणति तक ले जाकर विचार करें, तो यह कहा जा सकता है कि जहाँ समाज और व्यक्ति  के बीच अपेक्षाकृत पूर्ण सामंजस्य होता है, वहाँ कविता केवल गीत होती है और जहाँ  सामंजस्य घटने के बावजूद उनका संतुलन  बना रहता है, वहाँ कविता कभी गीत होती है और कभी केवल छंद। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि यहाँ की जनजातीय लोक कविता की गीतबद्धता  का, अनुभूति की सामूहिकता से, बड़ा प्रकृत संबंध है।’’2  आदिवासी कविता का यह समूह मन दो प्रकार से कविता में अभिव्यक्त होता है – एक तो उसका प्रकृति से सान्निध्य, पर्व, संस्कृति   तथा दूसरा विस्थापन की पीड़ा । अपने मौलिक पुरखा साहित्य में तो वह अपनी जीवनशैली  , कर्म और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य की अभिव्यक्ति करता रहा है, किन्तु हिन्दी  में प्रस्तुत आदिवासी मानस अपनी सांस्कृतिक पहचान, प्रकृति प्रेम को उजागर करने के साथ उसकी अस्मिता पर आए संकट को लेकर भी बेचैनी व्यक्त करता है। सुशीला सामद की हिन्दी कविता में उपस्थिति के पश्चात् सन् 1966  में दुलायचंद्र मुंडा के ‘नवपल्लव’  तथा 1986   में बलदेव मुंडा का ‘सपनों की दुनिया’  नामक कविता संग्रह का उल्लेख गंगा सहाय मीणा करते हैं किन्तु  लगभग इसी दौर में पदार्पित  रामदयाल मुंडा की कविता गीतात्मकता, लय, गेयता, सांस्कृतिक पहचान, शब्द, पंक्ति की आवृत्ति, सामूहिकता व वर्तमान विसंगति की पीड़ा  को समवेत रूप से अभिव्यक्त  करती है। पर निश्चित ही ये उपस्थितियाँ लम्बे -लंबे अंतराल के बाद आती हैं।

आधुनिक हिन्दी कविता की यात्रा में शहर, कस्बाई और ग्रामीण  जीवन  तथा मानव की सशक्त उपस्थिति रही है। उसके सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक सरोकार भी यहाँ जीवंत होते रहे किन्तु वन-प्रांतर का जीव-जगत इस अभिव्यक्ति में स्वयं उपस्थित नहीं हुआ । वर्तमान हिन्दी कविता में कई आदिवासी हस्ताक्षर  अपनी बात को सशक्त रूप से कह रहे हैं।  अनुज लुगुन की ‘बाघ और सुगना मुंडा की बेटी’ जैसी लंबी कविता अपनी समग्रता में सम्पूर्ण  आदिवासी जीवन दर्शन, संस्कृति चिंता, पीड़ा, और सहजीविता के अपने मूल सिद्धांत  को कहते हुए अपने अतीत की धरोहर और वर्तमान की चिंता को एक साथ साझा करती है।  अनुज लुगुन के अतिरिक्त निर्मला पुतुल, जसिंता केरकेट्टा, सरिता बड़ाईक, ग्लैडसन डंगडुंग, ग्रेस कुजूर, महादेव टोप्पो व अन्य अनेक कवि यहाँ निरंतर सृजनरत हैं।  ये सभी अपनी वैचारिकी के प्रति प्रतिबद्ध होकर उपस्थित है। ‘‘समकालीन हिन्दी कविता जहाँ उतर आधुनिकता से प्रभावित निषेध, अनास्था, मूल्यहीनता, नकारात्मकता की कविता है वहीं समकालीन आदिवासी कविता प्रकृति के प्रति आस्था, अपनी संस्कृति और मूल्यों को बचाने की छटपटाहट  तथा संगठित सामाजिक ताने-बाने  के बल पर सम्मानपूर्वक जीने की लालसा के साथ आदिवासी समाज की यथार्थ स्थिति को व्यक्त करने वाली कविता है।’’3

समकालीन हिन्दी  लेखन  में विविध विमर्शात्मक स्वर अपने-अपने  कथन व आग्रह को लेकर मुखर हुए हैं । परन्तु स्त्रीपक्ष ने जिस तरह कविता, कथा, उपन्यास विधा में अपना स्थान बनाया है, दलित  या आदिवासी उपस्थितियाँ उस तरह से न कविता के क्षेत्र में स्थापित हो पाई, न ही कथा-उपन्यास के क्षेत्र में । कुछ दलित आत्मकथाओं  ने अवश्य हिन्दी जगत को अत्यधिक प्रभावित किया। किन्तु   कविता के क्षेत्र में इन विमर्शात्मक स्वरों के आक्रोश, प्रतिरोध को सुना तो गया पर उसके काव्य रूप व सौन्दर्यशास्त्र को लेकर प्रायः आपत्तियों के स्वर सुने गए।

दलित  व आदिवासी लेखन पर सपाटबयानी को लेकर भी आरोप लगते रहे। जबकि दलित लेखन में इसका जोरदार विरोध किया गया तथा आक्रोश, प्रतिरोध के स्वर में रूप सौन्दर्य ढूँढने की जगह समता, न्याय व मानवता को सुनने -देखने का आग्रह किया गया। इस परिप्रेक्ष्य में यदि आदिवासी कविता का आकलन किया जाए तो यहाँ पहले भी स्पष्ट किया गया है कि आदिवासी पुरखा साहित्य का अपना रूप व कथ्य रहा है जो आदिवासी जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति है। सामूहिकता, सहअस्तित्व और समानता के आग्रही आदिवासी स्वर का हिन्दी में अवतरण भी अपने इस वैशिष्ट्य के साथ जुड़ा है। सरलता और सीधी बयानगी के पीछे उनकी सामूहिक अनुभूति, सहजीविता की जीवन शैली  है।  अपनी  बात  को  सजा संवारकर अन्योक्ति में अभिव्यंजित करने की प्रवृत्ति उनमें नहीं है। यह उनकी लोक चेतना का वैशिष्ट्य है। ‘‘भारतीय काव्यशास्त्र में किसी बात को सीधे-सीधे या अनलंकृत रूप में कहना ‘स्वभावोक्ति’  कहा गया है।  स्वभावोक्ति के प्रसंग में विभिन्न काव्य सम्प्रदायों की धारणा एक जैसी नहीं है। अलंकारशास्त्र में स्वभावोक्ति एक प्रकार का अलंकार है। अलंकार, कथन की शैली या कहने का ढंग (वाग्विकल्प)  है। इसलिए स्वभावोक्ति, जो एक प्रकार की उक्ति या कथन है, अलंकार है। कविता में सब कुछ एक ही ढंग से नहीं कहा जाता । बहुत सी स्थितियों में बिना तुलना और विरोध  के, बिना गोपन और अतिरंजना के, जो वस्तु  जैसी है, उसे उसी रूप में निवेदित करने की आवश्यकता होती है। इसलिए स्वभावोक्ति को काव्योक्ति के दायरे से बहिष्कृत नहीं किया जा सकता ।  गगग  काव्यशास्त्र  के वक्रोक्ति सम्प्रदाय ने तो इसे काव्य ही नहीं माना है।   उसके अनुसार  उक्ति के दो भेद है- स्वभावोक्ति और वक्रोक्ति । कविता वक्रोक्त है, उक्ति या कथन का वक्र (सामान्य से भिन्न)  रूप है, अतः स्वभावोक्ति काव्य नहीं हो सकती ।  गगग  किन्तु  आज हिन्दी में जो कविता लिखी जा रही है, वह स्वभावोक्ति या सपट बयानी को सबसे प्रामाणिक और सच्ची कविता मानकर लिखी जा रही है। उसके अनुसार वक्रता और अलंकार कविता की बैसाखियाँ हैं। जो कवि इनका सहारा लिये बिना अपनी बात सीधे-सीधे कह सकता है, वही सच्चा और समर्थ कवि है। आज सपट बयानी को न केवल हिन्दी में, बल्कि अन्य भाषाओं में भी काव्य लेखन के एक बड़े आदर्श के रूप में, महत्त्व दिया जा  रहा है। किन्तु प्रश्न है, जनजातीय कविता की तरह आज की लिखित परम्परा की कविता में समान रूप में सपटबयानी को महत्त्व दिये जाने का कारण क्या है?  मेरी समझ में जब कवि श्रोताओं या पाठकों के बड़े समुदाय से जुड़ना और उसे एक साथ संबोधित करना चाहता है, तब उसकी भाषा सीधी अभिव्यक्ति  या सपटबयानी की भाषा हो जाती है। उसकी स्थिति उस रचनाकार से भिन्न होती है, जिसका कवित्व पंडितों और प्रवीणों के आस्वाद के लिए होता हैः ‘पंडित और प्रबीनन को जोई चित्त हरै सो कविता कहावै।’  यहाँ की जनजातीय लोक कविता का श्रोता पंडित या प्रवीण न हो कर पूरा समाज है, इसलिए उसकी चिंता प्रत्यक्ष और तत्काल सम्प्रेषण की हैं उसकी सपटबयानी उसके सामाजिक और भाषिक दबावों की एकत्र  और स्वाभाविक  परिणति है।’’4 डाॅ. दिनेश्वर प्रसाद का उक्त मन्तव्य आदिवासी कविता की अभिधात्मक प्रस्तुति को समझने में स्पष्ट सहयोग देता है। आदिवासी कविता की सरल अभिव्यक्ति को हमें इसी परिप्रेक्ष्य में देखने  की जरूरत है। वैसे भी हिन्दी में  आदिवासी कविता अभी अपने प्रारंभिक दौर  में है। हालांकि  अनुज लुगुन जैसी उपस्थितियों ने हिन्दी कविता के मिज़ाज को समझकर आत्मसात किया तथा उसी लहज़े  में अपनी बात कही है।

आदिवासी कविता की मूल चिंता अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और जल -जंगल-जमीन  की चिंता को साझा करना है। ये समाज आदिम संस्कृति का वाहक है जो दीर्घावधि तक जंगलों में उपेक्षित जीवन जीता रहा, तथाकथित मुख्य धारा के लिखित साहित्य ने इसे असुर, राक्षस, दानव-दैत्य कह कर असंगत रूप दिया। इनके पास अपना समृद्ध व अत्यंत तार्किक जीवन दर्शन है, जिसमें वह स्वतंत्रता, समता का भाव निहित है जिसे कथित सभ्य समाज द्वारा बार-बार अवहेलित किया जाता रहा है। इसी समुदाय की सीधी अभिव्यक्ति उनकी काव्य-प्रस्तुति  में होती है। इनके स्वर में आक्रोश और प्रतिरोध का तीक्ष्ण स्वर नहीं है किन्तु उजड़ने की गहरी पीड़ा व विरोध है। यह वही समाज है जिसमें सोनी सोरी जैसी आम महिला  के साथ तंत्र, व्यवस्था द्वारा घोर अमानवीय व्यवहार किया गया है। शोषण, अन्याय और बार-बार का विस्थापन उन्हें अपनी जड़ों  से अलग कर देता है और कथित सभ्य समाज  के लिए वे ऐसे असभ्य जंगली मजदूर  है जिनका अति दोहन, शोषण  करना वो अपना अधिकार समझते हैं। इनकी यही पीड़ा  व सांस्कृतिक उच्छेदन का कष्ट उनकी काव्य अभिव्यक्तियों में प्रकट होता है। जो जीवनशैली, संस्कृति व मानव समुदाय प्रकृति पर पूर्णतः अवलंबित है उसे उससे विच्छिन्न करना  बेशक अत्यन्त पीड़ा दायक है। जो संस्कृति सृष्टि  और सम्पूर्ण  प्रकृति के प्रति प्रेम, करूणा और उदारता का भाव रखती हो, उसको जड़ों   से उच्छेदित करना निश्चित  ही पूँजीवादी  समाज के घोर स्वार्थ  और लोभ का परिणाम है। नदी, पहाड़, पशु पक्षियों, वृक्षों, सूर्य, चाँद, तारों, बादलों से प्रेम करने वाली, धरती व प्रकृति  के प्रति सतत   कृतज्ञता भाव रखने वाली संस्कृति  के प्रति जो घोर अन्याय विकासवादी दृष्टि  ने किया है, उसकी मुखर अभिव्यक्ति  ही उनका काव्य -कथन है। ‘‘समकालीन आदिवासी लेखन की काव्य चेतना आदिवासियों के मूल आदिम स्वर, जीवनशैली  और सोच  को अक्षुण्ण बनाए रखने वाली रचनात्मक अभिव्यक्ति है। दरअसल आदिवासी संस्कृति, सोच और दृष्टि, गैर आदिवासी समाज की व्यक्तिवादी, सामंती, साम्राज्यवादी व कहीं राजतंत्रवादी सोच व दृष्टि के एकदम विपरीत है। वे व्यक्तिपरक नहीं, सामूहिक सोच, सामूहिक जीवन शैली, सामूहिक जिन्दगी जीते है, जहाँ ऊँच -नीच का सवाल ही नहीं है। यह समाज लोकतंत्र का पोषक है। आदिवासी कविता जहाँ लोगों से संवाद कायम करती है वहीं परस्पर दर्द का रिश्ता कायम करना भी जरूरी समझती है ताकि हम और वे की दूरियाँ मिट जाएं । ये कविताएँ आदिवासी समाज की सच्चाइयों को ही नहीं व्यक्त करती अपितु जोखिम उठाने की शक्ति भी देती हैं। कुल मिलाकर आदिवासी कविता के केन्द्र में मुक्ति की कामना है। इस प्रकार समकालीन आदिवासी कविता अज्ञानता से मुक्ति, कमजोरियों से मुक्ति और विस्थापन के कारण उनके जीवन में आई विसंगतियों   से मुक्ति का आह्वान करती है।’’5

पचास  के दशक में हिन्दी कथालेखन में पदार्पण करने वाली ‘एलिस एक्का’  (जो बिरसा मुंडा के परिवार से संबद्ध थी)  को वंदना टेटे हिन्दी की पहली आदिवासी (स्त्री)  कथाकार’   मानती है ।  उनकी पहली कहानी ‘वनकन्या’  ‘आदिवासी’  पत्रिका  (राँची)  (17 अगस्त 1961) अंक 28-29 में छपी। उन्होंने साप्ताहिक पत्रिका ‘आदिवासी’ (राँची)  में 1947   से लिखना शुरू किया। प्राप्त जानकारी  अनुसार वंदना टेटे उनकी पहली रचना को खलील जिब्रान का अनुवाद बताती हैं। जो ‘आदिवासी’ पत्रिका (राँची) में अगस्त 1959 में छपी। हालांकि इस क्षेत्र  में अधिक शोध की संभावना है। एलिस एक्का  के अतिरिक्त प्यारा केरकेट्टा (खड़िया), रघुनाथ मुर्मू (संताली),  लको बोदरा (हो), बलदेव मुंडा (मुंडारी), आयता उराँव (कुडुख) को कथा लेखन की पहली पीढ़ी  में रखती है। दूसरी पीढ़ी में तेमसुला आओ, रोज केरकेट्टा, रामदयाल मुंडा, वाल्टर भेंगरा तरूण, पीटर पाॅल एक्का, कृष्णचंद्र टुडू, नारायण, येसे दरजे थोंगशी, लक्ष्मण गायकवाड़, शिशिर टुडू, मंगल सिंह मुंडा को तथा तीसरी पीढ़ी  में फ्रांसिस्का कुजूर, सिकरा दास तिर्की, रूपलाल बेदिया, ज्योति लकड़ा,  कृष्णमोहन सिंह मुंडा, गंगा सहाय मीणा, राजेन्द्र मुंडा, सुंदर मनोज हेम्ब्रम और जनार्दन गोंड को उन्होंने  शामिल  किया है। 6  इन लेखकों में कई की कहानियाँ अनूदित  व कई ने मूल हिन्दी में सृजित  की है। हिन्दी  के मुख्य कथा लेखन में हम उक्त में से प्रायः किसी का उल्लेख नहीं पाते। हालांकि इनमें से कई लेखक आदिवासी भाषाओं में सृजनरत रहे हैं ।  अनुवाद न होने को एक समस्या के रूप में देखा जा सकता है, फिर भी  मूल हिन्दी में किये गए कथा लेखन का उल्लेख न होना हिन्दी जगत की आदिवासी लेखन के प्रति अवहेलना  को दर्शाता है। बेशक वर्तमान में इन कहानियों के ठोस मूल्यांकन  की आवश्यकता है। हमें लगता है यहाँ अनूदित और मूल हिन्दी में लिखे आदिवासी लेखन के बीच एक रेखा खींचना भी जरूरी  है। वस्तुतः  आदिवासी भाषाओं में  विपुल मात्रा में पुरखा साहित्य है। यह निश्चित ही हिन्दी  का मौलिक लेखन नहीं है। वर्तमान स्थिति चूंकि आदिवासी लेखन की प्रारंभिक स्थिति है, ऐसे में आदिवासी लेखन में उनके कथन  व जीवन दर्शन को समझने के लिए अनूदित और मूल हिन्दी  लेखन में भेदभाव चाहे न किया जाए किन्तु भविष्य  में इस विभाजन  की आवश्यकता पड़ना निश्चित है।  आदिवासी लेखन  में उनकी गीत परंपरा, तथा कथा लेखन में वस्तु और शिल्प को समझकर उनकी हिन्दी में प्रस्तुत कविता व कहानियों को समझना आसान होगा।   यहाँ आदिवासी लेखकों की आपत्तियों पर भी ध्यान देना होगा। वे चाहते हैं कथित मुख्य धारा उनकी वास्तविक स्थिति  को समझे। ‘‘बेचारगी और क्रांति, ये दो ही स्थितियाँ है, जिनकी परिधि में वे आदिवासियों  को देखते हैं। चूंकि  गैर आदिवासी समाज में उनका बड़ा तबका, जो भूमिहीन और अन्य संसाधनों   से स्वामित्व विहीन  है, बेचारा है, इसलिए वे सोच भी नहीं पाते  कि इससे इतर आदिवासी समाज, जिसके पास संपत्ति की कोई निजी अवधारणा नहीं है, वह बेचारा नहीं है। वे समझ ही नहीं पाते कि उसका नकार ‘क्रांति’  (सत्ता)  के लिए किया जाने वाला प्रतिकार नहीं, बल्कि समष्टि के बचाव और सहअस्तित्व के लिए है। जो सृष्टि ने उसे इस विश्वास के साथ दिया है कि वह उसका संरक्षक है, स्वामी नहीं।’’7

आदिवासी कविता की तरह कथा लेखन में भी यह स्थिति  है कि अधिकांश कवि, कथाकार झारखंड  से संबंधित  है जो मूल रूप से हिन्दी में भी सृजनरत है। झारखंड के अतिरिक्त  राजस्थान, महाराष्ट्र से आने वाले आदिवासी लेखक  अवश्य हिन्दी में सक्रिय उपस्थिति  दर्ज करा रहे हैं। इधर म.प्र. से हिन्दी में मौलिक लेखन न्यूनतम है। एलिस एक्का, रामदयाल मुंडा, रोजकेटकेट्टा, पीटर पाॅल एक्का, मंगल सिंह मुंडा, वाॅल्टर भेंगरा तरूण, रूपलाल बेदिया   आदि कथाकारों ने आदिवासी जीवन व परिवेश को अपनी कहानियों में आकार दिया है। आदिवासी कथाकारों द्वारा आदिवासी जीवनदर्शन, संस्कृति, जीवनशैली व उनके समग्र जीवन को किस सीमा तक कहानियों  में प्रस्तुत  किया है, यह देखा जाना जरूरी हैं । आदिवासी लेखन द्वारा ही आदिवासी जीवन का समग्र, उसका अतीत, विरासत, संस्कृति और वर्तमान दृश्य समाज के सम्मुख  प्रस्तुत  हो सकता है। इस कार्य में वे जितना सफल होंगे उतना ही बाह्य समाज से  उनका संवाद स्थापित  हो सकेगा तथा उनकी चिंताएँ, समस्याएँ अधिक सुनी जा सकेंगी। यह साहित्य उनकी संस्कृति को संरक्षित  भी कर सकेगा।   यह निश्चित है कि एक स्थापित, वृहद सामाजिक संरचना के सम्मुख उपस्थित होकर उन्हें अपने अस्तित्व की चिंता है। किन्तु यही स्थिति   उनके लिए चुनौती भी है। आदिवासी  लेखन अपनी समृद्ध धरोहर, विचार-चिंतन और जीवनशैली को इस समाज से साझा करके उसके वैशिष्ट्य और संतुलित दृष्टि  के प्रति सहमति प्राप्त कर सकता है। हमें यह देखना  है कि हिन्दी  में प्रकाशित आदिवासी लेखन अपने अभीष्ट तक किस सीमा तक पहुुँच पाया है। प्रायः आदिवासी चिंतक अपना घोषणा पत्र जारी करते हुए या जीवन दर्शन प्रस्तुत करते हुए कई मायने में आदर्श स्थिति में उपस्थित होते हैं। किन्तु आदिवासी समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आज संस्कृतिकरण और संक्रमण के दौर में है जिसके फलस्वरूप धर्मांधता, धन लोलुपता, लैंगिक भेदभाव, पितृसत्तात्मकता का दखल उनके जीवन में भी हुआ है।  इन विसंगतियों व उसके कुप्रभाव  को  हम उनकी कहानियों द्वारा ही समझ सकते हैं। पूर्वांचल का आदिवासी समाज ईसाई और बौद्ध धर्म के प्रभाव में आकर और कथित मुख्यधारा के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था को ग्रहण करके भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने में सफल हुआ है। मध्य, दक्षिण व पश्चिम भारत के आदिवासी समाज के सम्मुख भी इन स्थितियों के सम्मुख अपनी दृढ़ता व विश्वास को प्रकट करने का समय है। उनका कथाजगत तमाम विपरीत परिस्थितियों में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों, परिवर्तनों, प्रभावों को सम्मुख लाएगा। आदिम संस्कृति के प्रतिनिधि आदिवासी कथाकार सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, और मानवीय रूप से उनके जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित कर सकते हैं। हिन्दी में इस दृष्टि से उनका मूल्यांकन अपेक्षित है। सत्ता, प्रशासन और संपूर्ण व्यवस्था द्वारा प्रकृति के प्रांगण में रहने वाले आदिवासी समुदाय के प्रति घोर अन्याय हुआ है। उनके विरोध के उग्र रूप का विरोध सामान्य बात है किन्तु  अहिंसक व शांत जीवनयापन करने वाले समताप्रेमी आदिवासी समाज की वास्तविकता  को उन्हीं की जुबानी जानना, समझना जरूरी है। कहानी और उपन्यास विधा इस तरह की अभिव्यक्ति  के लिए बेहतर जगह उपलब्ध  कराते हैं। आदिवासी कथा लेखन उनकी सांस्कृतिक, प्राकृतिक जीवन व वर्तमान परिवर्तनों को उकेरने का महत्तर माध्यम है। आदिवासी  जीवन के अंतरंग, प्रकृति, पर्व, त्योहार, लोकगीत, खेल, विश्वास, रहन-सहन, रीति-रिवाज, श्रम, संगीत, स्त्री शोषण, प्रेम, विस्थापन, जीवन संघर्ष, शोषण आदि का चित्रण आदिवासी कथा जगत के कथ्य बनकर सम्मुख आते हैं।

आदिवासी  आलोचक गंगासहाय मीणा मेन्नस ओड़ेय के मंुडारी उपन्यास  ‘मतुराअ कहनि’ (1920) को पहला आदिवासी उपन्यास कहते हैं।  इसके अतिरिक्त पीटर पाॅल एक्का, वाटर  भेंगरा तरूण, हरिराम मीणा,  मंगल सिंह मुंडा, अजय कुडुलना आदि अन्य उपन्यासकार हैं। कथा लेखन की तरह उपन्यासों  की विषयवस्तु भी आदिवासी जीवन से संबद्ध है। आदिवासी लेखन में उपन्यास विधा अभी प्रारंभिक स्थिति में है तथा मूल हिन्दी  में अभी अधिक लेखन कार्य सम्मुख नहीं आया है। किन्तु यह सही है कि आदिवासी रचनाकार साहित्य की विविध विधाओं में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं, जिसका स्वागत जरूरी है।

आलोचना के क्षेत्र में भी आदिवासी लेखक सक्रिय हुए हैं।  रामदयाल मंुडा, वंदना टेटे, गंगासहाय मीणा, सुनील कुमार सुमन, हरिराम मीणा, वाहरू सोनवणे , केदार प्रसाद मीणा की आलोचना पुस्तकें  सम्मुख आई हैं। इनमें वंदना टेटे का काम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण  है। कुछ नाटक भी आदिवासी लेखकों द्वारा रचे गए है। प्यारा केरकेट्टा, सुनील कुमार सुमन, प्रभात, सिद्धेश्वर सरदार, जोवाकिम तोपनो, मंगल सिंह मुंडा, चंदालाल चकवाला आदि के नाटक या एकांकी प्रकाश में आए हैं। इसके अतिरिक्त कुछ आत्मकथाएं व यात्रा संस्मरण भी सम्मुख आए है। हरिराम मीणा, टी.टी. डामोर, धनपत सिंह के यात्रावृत्तांत  उल्लेखनीय है। आत्मकथा  के रूप में फा. जोवाकिम डुंगडुंग की ‘आत्मबल की सफलता’  नामक आत्मकथा प्रकाश में आई है।  इसके अतिरिक्त लक्ष्मण गायकवाड़  की ‘उचक्का’  को भी इसी क्रम में रखा जा सकता है।

प्रचुर मात्रा में न होने के बावजूद आदिवासी हिन्दी लेखन में साहित्य की सभी विधाओं -कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, नाटक, व्यंग्य, संस्मरण यात्रावृत्तांत आदि में प्रकाशित  रचनाएँ सम्मुख आई हैं। हालांकि ये प्रस्तुतियाँ बड़े प्रकाशकों के यहाँ से नहीं आई फलतः  इनकी उपलब्धता व वृहत् हिन्दी समाज से इनका परिचय अधिक नहीं है। रामदयाल मुंडा के बाद वंदना टेटे का आलोचनात्मक, वैचारिक लेखन अत्यंत गंभीर  है।  उनकी स्थापनाएँ भी संतुलित एवं विचारोत्तजक हैं। जरूरी  है कि बड़े प्रकाशन इन्हें प्राथमिकता दें ताकि हिन्दी जगत इस नयी प्रस्तुति से विस्तृत रूप से परिचित हो। गंगा सहाय मीणा, हरिराम मीणा आदि ने भी आदिवासी समाज व लेखन  का परिचय प्रस्तुत करने का गंभीर कार्य किया है। रमणिका फाउंडेशन तथा स्वयं रमणिका गुप्ता ने भी आदिवासी लेखन  को प्रस्तुत करने का दायित्व संभाला है। गंगासहाय मीणा कहते हैं कि आदिवासी पुरखा साहित्य लगभग तीन सौ आदिवासी भाषाओं  में बिखरा पड़ा है जो अपनी पुरातन गीत परम्परा के अतिरिक्त साहित्य की परिचित अन्य विधाओं  में भी उपलब्ध है। हालांकि उनके मतानुसार ‘‘आदिवासी भाषाओं में लिपियाँ  विकसित होने की शुरूआत अब से लगभग डेढ़ सौ साल पहले हो गई। अब तक एक दर्जन  से अधिक आदिवासी भाषाओं की लिपियाँ तैयार हो चुकी हैं। कई आदिवासी भाषाओं  ने पड़ोस की किसी बड़ी भाषा की लिपि को स्वीाकर कर लिया है। निष्कर्षतः आदिवासी भाषाओं में लेखन और मुद्रण की परम्परा भी सौ साल से अधिक पुरानी है। इस परम्परा की और पड़ताल किए जाने की जरूरत  है। मौजूदा स्रोत सामग्री  के अनुसार मेन्नस ओडे़य का ‘‘मतुराअ कहनि’ नामक मुंडारी उपन्यास  पहला आदिवासी उपन्यास है। यह बीसवीं सदी के दूसरे दशक में लिखा गया। इसके एक भाग का अनुवाद हिन्दी  में ‘चलो चाय बागान’  शीर्षक  से किया गया।’’8 हिन्दी आदिवासी लेखन से हिन्दी जगत का परिचय  अभी नया है। यदि हम पहली आदिवासी कविता, कहानी या उपन्यास की खोज करते हैं तो संभव है यह अंतिम रूप से निर्णयात्मक न हो किन्तु जिस  तरह की स्थापनाएँ आदिवासी लेखक प्रस्तुत कर रहे हैं उनका लगातार प्रकाश  में आना जरूरी है। गंगासहाय मीणा पहले  आदिवासी उपन्यास की ही भाँति पहली कविता के विषय में वंदना टेटे के बाद अपना आकलन व मतान्तर प्रस्तुत करते हैै। मीणा की स्थापना है- ‘‘ हिन्दी आदिवासी  कविता में पहला नाम सुशीला  सामद का है, लेकिन इसके बाद एक निरंतरता का अभाव दिखाई  देता है। इसलिए समकालीन हिन्दी आदिवासी  कविता की  शुरूआत हम रामदयाल मुंडा  की कविताओं से  मान सकते है, जिन्होंने   मुंडारी के साथ हिन्दी  में भी कविताएँ  लिखी है। उनके बाद ग्रेस हुजूर, रोज केरकेट्टा  हरिओम मीणा, महादेव टोप्पो, निर्मला पुतुल, वंदना टेटे, विजय सिंह मीणा, ज्योति लकड़ा, अनुज लुगुन, जसिंता केटकेट्टा  आदि के नाम उल्लेखनीय  है।  कथा लेखन के क्षेत्र में  वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’  पीटर पाॅल एक्का, रोज केटकेट्टा, मंगल सिंह मुंडा, विजय सिंह मीणा आदि प्रमुख है। इन्होंने  आदिवासी साहित्य को सैकड़ों   कहानियाँ और लगभग आधा दर्जन उपन्यास दिए हैं। शंकरलाल मीणा व्यंग्य और कहानी, दोनों क्षेत्र  में सक्रिय हैं। हरिराम मीणा ने यात्रा वृतांत व संस्मरण भी लिखे हैं।’’9

कविता, कहानी, उपन्यास के क्षेत्र में  इस तरह की स्थापनाओं  के अतिरिक्त वंदना टेटे  आदि आदिवासी अध्येताओं ने हिन्दी जगत की उपेक्षा को लेकर भी कई आपत्तियाँ  दर्ज कराई हैं। पहली आदिवासी कवयित्री पर छायावाद के प्रभाव व प्रशंसा के बावजूद हिन्दी  साहित्य के उनकी अनदेखी पर उनकी टिप्पणी  सम्मुख  आती है।‘‘ सुशीला सामद  हिन्दी की पहली महिला आदिवासी कवयित्री, संपादक  और सुराजी स्वतंत्रता सेनानी है। उनकी कविताएँ  महादेवी की रचनाओं की ही तरह  काव्य कला के उत्कर्ष पर  हैं क्योंकि ‘सरस्वती पत्रिका’  के संपादक के शब्दों  में  अपने ‘पहले ही प्रयास में उन्होंने कमाल किया है।’ यह सही है कि महादेवी तत्कालीन भारत के हलचल भरे साहित्यिक केन्द्र  में रहने के कारण ही अपनी उपस्थिति को स्वीकार करवा सकीं। छायावाद  के चार प्रमुख कवियों में उनकी गिनती होती है।  ‘नीरजा’  के लिए 1934 में उन्हें  ‘सक्सेरिया पुरस्कार’ मिला। लेकिन, नागर सभ्यता और साहित्य से दूर, अहिंदी भाषी सारंडा (झारखंड) के प्राचीनतम वन क्षेत्र में स्थित चाईबासा निवासिनी आदिवासी सुशीला सामद को ऐसा अवसर नहीं उपलब्ध हुआ। वे तब भी अजानी रह गई और  आज भी विस्मृति  का शिकार हैं।  गगग सुशीला सामद को हिन्दी साहित्य के इतिहास से  मठाधीशों  ने फाड़कर फेंक दिया है। इसलिए कि  आदिवासी हिन्दी  के आरंभिक काल से ही लिख रहे हैं। इसलिए कि गैर हिन्दी भाषी होते हुए भी अपने पहले ही कविता संकलन से तत्कालीन कविता में शीर्ष  को छू लेने वाली इस आदिवासी कवयित्री  को वे स्वीकार नहीं करना चाह रहे थे। इसलिए कि वे महिलाओं को लेखन का श्रेय देने को तैयार नहीं हैं। और इसलिए भी कि वे आदिवासियों के प्रबल स्वर को दबाना चाहते हैं। साहित्य का समूचा इतिहास लेखन आधा-अधूरा, नस्लीय, सामंती व लैंगिक भेदभाव से भरा है। सुशीला की उपेक्षा और अनुपस्थिति यही दर्शाती है।’’10  पहली बार आदिवासी कवयित्री को लेकर की गई इस आपत्ति के अतिरिक्त वंदना टेटे  पहली आदिवासी कथाकार एलिस एक्का  की उपेक्षा पर भी असंतोष अभिव्यक्त करती हैं। उनकी ये आपत्तियाँ हिन्दी  -जगत  के लोकतंत्र पर  प्रश्न चिह्न हैं। अतः इसका रेखांकित होना जरूरी  भी है। उनका मन्तव्य है – ‘‘यदि हम हिन्दी कथा साहित्य में ही आदिवासी लेखन की बात करें तो पचास -साठ के दशक से ही अपनी आबादी के अनुपात में आदिवासी साहित्य में मौजूद थे। झारखंड की एलिस एक्का उन शुरूआती कथाकारों में से हैं, जिसे अंधेरे में रखकर गैर आदिवासी लेखकों को आदिवासी जीवन का पहला रचयिता घोषित कर दिया गया। यही नहीं, बाद में जिन आदिवासी कहानीकारों ने एलिस की परम्परा को आगे बढ़ाया, उन्हें ‘औसत’ बताकर खारिज कर दिया।  मसालेदार सौन्दर्य के मानकों पर, जिन्हें ‘रस’ परम्परा के आचार्यों  ने स्थापित किया है, एक भिन्न सांस्कृतिक विश्व और दर्शन वाले आदिवासी कहन और उसकी शैली को परखना सिवाय पूर्वाग्रह के कुछ और नहीं है। सीधे -सीधे कहें तो आदिवासी अगर उनकी भाषा में उनकी ही तरह से नहीं कहते हैं तो वह ‘कहना’ नहीं है।’’11

आदिवासी लेखन  में आत्मकथा  की लगभग अनुपस्थिति के विषय में गंगा सहाय मीणा कहते हैं कि आदिवासी समाज  सामूहिकता में विश्वास करता है तथा उनमें  ‘व्यक्ति’ या ‘आत्म’ की जगह समुदाय प्रमुख है। किन्तु इस विधा को आत्म बनाम समूह के रूप में देखा जाना उचित नहीं लगता।  दलित लेखन में आत्मकथाएँ  सर्वाधिक चर्चित विधा रही हैं जिसने दलित समाज के प्रति शोषण, अन्याय, असमानता को प्रकट किया है। दलित लेखक घोषणा करते हैं कि उनके ‘व्यष्टि’ में ‘समष्टि’ भाव समाहित है तथा यह ‘आत्म’ पूरे समुदाय के उत्पीड़न का प्रतिनिधित्व करता है। आत्मकथाओं के माध्यम  से ही उन्होंने  हिन्दू सामाजिक संरचना में जारी असमानता के क्रूर रूप को प्रस्तुत किया है। यह सही है कि आदिवासी दर्शन  ‘साहचर्य, सामूहिकता, सहजीविता को प्रधानता देता है। किन्तु दलित आत्मकथाओं  के ‘आत्म’  में भी उनका ‘समूह’  निहित है। उनकी पीड़ा  व्यक्तिगत न होकर पूरे समाज की पीड़ा की अभिव्यंजना है। वस्तुतः आत्मकथा हो या कविता, ये कथन की एक विधा है, दोनों के माध्यम से समूह का भाव अभिव्यक्ति पा सकता है। इसी आधार पर हम हिन्दी की दलित आत्मकथाओं को सामान्य आत्मकथाओं से अलग करते हैं। सामान्य आत्मकथा में ‘आत्म’ प्रमुख हो सकता है किन्तु दलित आत्मकथा का ‘आत्म’ ‘उसके ‘समुदाय’  की समग्र अभिव्यक्ति है। इसमें व्यक्ति गौण है। यह सही है कि आदिवासी वाचिक साहित्य में गीति तत्त्व प्रधान है जिसके कारण काव्य में  आदिवासी लेखन की उपस्थिति अधिक सहज है। इसके बावजूद वे कविता के अतिरिक्त अन्य विधाओं में भी सक्रिय होकर महत्त्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ दे रहे हैं। आदिम संस्कृति की मूल पहचान उनकी गीतात्मकता, संगीत और वादन में है जो परंपरागत रूप से लंबे समय से उनके जीवन -जगत  का अभिन्न अंग है। फलतः काव्य क्षेत्र  में हमें उनकी स्वाभाविक गीत-संगीत की आदिम ध्वनि रोमांचित करती है। रामदयाल मुंडा के गीत इसके उदाहरण है।

आदिवासी चिंतक जिस आदिवासी दर्शन की स्थापना करते हैं, उनकी  रचनाएँ किस हद तक उस  आदिवासी  सांस्कृतिक  परंपरा, दर्शन, या विस्थापन की पीड़ा  को अभिव्यंजित करती हैं, यह अभी देखा जाना है। कई आदिवासी लेखक कस्बे, शहर  में पले बढ़े हैं, उन पर बाह्य संस्कृति का कितना प्रभाव पड़ा है तथा उनके मानस में किस हद तक अपनी सांस्कृतिक धरोहर संरक्षित है, यह भी देखा जाना है। हालांकि आदिवासी लेखकों की आपत्तियाँ  दर्शाती हैं कि विमर्श मूलक आदिवासी साहित्य की आलोचना के लिए कथित मुख्य धारा के साहित्य के प्रतिमान उन पर आरोपित  न किए जाए। यह सही भी है । चूँकि आदिवासी जीवन दर्शन, संस्कृति, भाषा, धर्म पूरी तरह एक भिन्न पहचान रखता है अतः उनका मूल्यांकन उनकी वैचारिकी  के अनुसार होना अधिक उचित है। साहचर्य, सहअस्तित्व, समानता पर आधारित इस जीवनदर्शन में भी पितृसत्तात्मक  मानसिकता का प्रभाव या लैंगिक  असमानता कोई दुर्लभ चीज नहीं है। ऐसे में यह भी आशा की जानी चाहिए कि गैर आदिवासियों  द्वारा की गयी टिप्पणी को आदिवासी लेखक भी उदारतापूर्वक  लें। स्वस्थ  आलोचना मार्ग प्रशस्त करने का ही कार्य करती है। दरअसल यह उदारता दोनों पक्षों द्वारा अपेक्षित है। आदिवासी दर्शन व मानक अनुसार उनके साहित्य  के मर्म को समझा जाना अत्यंत आवश्यक है। आवश्यक यह भी है कि हिन्दी का लोकतंत्र सभी को समान रूप से ग्रहण करे। प्रायः विमर्शमूलक चिंतन  हठधर्मी आग्रहों से जल्दी ही पीड़ित  हो जाते हैं। हालांकि सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति सहजीविता का आग्रह  रखने वाली आदिवासी वैचारिकी  में आक्रोश के तीव्र स्वर न्यूनतम है। मत-मतांतर, पक्ष-प्रतिपक्ष विषयक  आग्रह इस विमर्श को भलीभाँति समझने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।  सामान्यतः स्वाभाविक कलाप्रेमी, संगीत प्रेमी आदिवासी समुदाय की निश्छल सहजता उनकी रचनाओं में भी मिलेगी ।  उनका संघर्ष अपने अस्तित्व और  संस्कृति  की रक्षा का है। साथ ही उनके पास एक निसर्ग प्रेमी,  सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, प्राकृतिक न्याय व समानता युक्त जीवन दृष्टि है । हिन्दी साहित्य को ं यह उपस्थिति  अधिक समृद्ध ही करेगी। हरिराम मीणा के मतानुसार – ‘‘इतिहास, संघर्ष, संस्कृति और  श्रम आधारित  जीवनशैली की लंबी परम्परा, प्रकृति प्रदत्त निग्र्रन्थ मन और अभाव, विस्थापन, पलायन की त्रासदी  का एक बड़ा  परिवेश उनके जीवन से ताल्लुक रखता है। इन सबकी अभिव्यक्ति अगर हो पाती है तो निश्चित रूप से बेहतरीन साहित्य की संभावनाएँ बनती हैं, चाहे उसे आदिवासी रचे या गैर आदिवासी ।’’ समग्रतः सांस्कृतिक सम्पन्नता और पीड़ा के  संयोग से उत्पन्न भारत के इन आदिम व मूल रहवासियों  के लेखन का उदारता पूर्वक स्वागत वास्तविक भारतीय लेखन को समझने के लिए अपरिहार्य है।

 

संदर्भ

1      आदिवासी साहित्य -अक्टू.15 – मार्च 16, सुशीला – हिन्दी की पहली आदिवासी  लेखिका – वंदना टेटे, पृष्ठ 08

2      चैमासा – 50-51,  जुलाई-99 – फरवरी-2000 , झारखंड की जनजातीय लोक कविता – डाॅ. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ 186

3      आदिवासी साहित्य – अक्टू. -2015,   मुक्ति की बेचैनी आदिवासी काव्य में – डाॅ. मलखान सिंह, पृष्ठ – 32

4      चैमासा – 50-51,  जुलाई 99- फरवरी  2000, झारखंड की जनजातीय लोक कविता – डाॅ. दिनेश्वर प्रसाद, पृष्ठ 186-187

5      आदिवासी साहित्य – अक्टू. 2015-मार्च 2016, मुक्ति की बेचैनी  आदिवासी काव्य में – डाॅ. मलखान सिंह, पृष्ठ 35

6      लोकप्रिय आदिवासी कहानियाँ – वंदना टेटे- प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 6-7, 

7      वही, पृष्ठ 8

8      आदिवासी चिंतन की भूमिका – गंगा सहाय मीणा  पृष्ठ 48

9      वही, पृष्ठ 49

10     आदिवासी साहित्य- अक्टू-15 मार्च 16,‘सुशीला हिन्दी की पहली आदिवासी लेखिका -वंदना टेटे  पृष्ठ 15

11     लोकप्रिय आदिवासी कहानियाँ – (2017)- वंदना टेटे,  प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ 7-8

 

पुनीता जैन

शिक्षा                 –      एम.ए., पीएच.डी.

प्रकाशन         –      पुस्तकें – ‘विद्यानिवास मिश्र और उनके ललित निबंध’,

‘हिन्दी दलित आत्मकथाएँः एक मूल्यांकन’

पत्र पत्रिकाओं में आलेख एवं कविताएँ प्रकाशित, आदिवासी साहित्य के आलोचनात्मक लेखन में सक्रिय।

सम्मान          –      वीरांगना सावित्री बाई फुले राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड,

अन्तर्राष्ट्रीय तथागत सृजन सम्मान,

नवनिकष तरंग सृजन सम्मान ।

सम्प्रति          –       प्राध्यापक, हिन्दी, शा.स्नातकोत्तर      महाविद्यालय, भेल,

भोपाल ।

पता                  –    जी-03, फाॅर्चून ग्लोरी एक्सटेंशन,

ई-8 एक्सटेंशन, बावड़िया कलाँ, भोपाल – 462 039

मो. 94250-10223

 

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