मेरे बाबूजी

खंभा दीवार नींव थे घर के मेरे बाबूजी रूप थे हुनर के। उनमे थी सबको मिलाने की चाहत मरी धरती को जीलाने की चाहत दीदी की आशा भैया की उम्मीदें अम्मा की सजने-सजाने की चाहत, भीतर मोम मगर बाहर पत्थर थे।। गिनते न पैसा अतिथि के सम्मान में बड़ा सा मन था उस पतली सी जान में चाहता रहा मैं उन्हें जान पाऊँ पर कैसे घूमूँ पूरे आसमान में आधा साहस, आधा मेरा डर थे।।…

"मेरे बाबूजी"

महान मानव

अपने अथक मेहनत के दम पर निरन्त प्रगति करता मानव रोज नए इतिहास लिख रहा है और सीख रहा है नित नए ज्ञान-विज्ञान रोज बनना चाहता है महान, अति-महान। आज की प्रगति देखकर विश्वास नहीं होता कभी इतिहास के उन अशआरों पर जब कहा जाता है – आदमी जंगली था नंग-धड़ंग रहता था न खाने का सलीका न था बोलने-चलने का शऊर आदमी बिलकुल बर्बर था तब। तब नदी, पहाड़, पेड़, बादल चाँद-सूरज पशु-पक्षी सबसे…

"महान मानव"

महादेव

केवल पर्वत पर विराजने से टूटी झोपड़ी में वास करने से भांग-धतूरे खाने से गंगा को शरण देने से गरल पान करने से भूतादि गणों को साथ रखने से मृग-छाला पहनने से बदन में भष्म लेप करने से और त्रिनेत्र रखने मात्र से ही कोई महादेव नहीं बन जाता महादेव बनते हैं शिव कि वे अपरिमित शक्ति के सागर हैं कुछ भी असंभव नहीं है उनके लिए फिर भी विराजते हैं पर्वत पर स्वर्ग का…

"महादेव"

सबकी सुनते हैं भगवान शिव

आज महाशिवरात्रि है। हिंदुओं का प्रमुख त्योहार। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। कहा जाता है कि भोलेशंकर राम नाम के रसिक हैं। शमशान घाट एवं वहाँ जलने वाले मुर्दे की भस्म को शरीर में धारण करने वाले भोलेशंकर पूर्ण निर्विकारी हैं। उन्हें विकारी मनुष्य पसंद नहीं हैं। कहा यह भी…

"सबकी सुनते हैं भगवान शिव"

काठ की गाड़ी सी ज़िन्दगी

पहिया है इंजन नहीं है गतिशीलता नहीं है जड़वत पड़ी रहती है ज़िन्दगी काठ की गाड़ी सी सुन्दर सुडौल आकर्षक भी। जब इंजन नहीं है गतिशीलता नहीं है तब पहिया-युक्त जड़ बनी रहती है ज़िन्दगी। पुरजोर दम लगाकर धक्का देना है आगे बढ़ाना है गतिशील बनाना है और खुद को करना है आभास इंजन होने का नहीं तो सड़ जायेगी जिंदगी काठ की गाड़ी सी पड़े-पड़े एक ही ठाँव। ********* – केशव मोहन पाण्डेय

"काठ की गाड़ी सी ज़िन्दगी"

मैं डरता हूँ

यह सत्य है मैं डरता हूँ। मैं डरता हूँ कि रिश्ते टूट न जाएँ अपने छूट न जाएँ सिर्फ इसीलिए आइना नहीं दिखता अतार्किक या तार्किक ज्ञान की बातें नहीं समझाता हाँ, स्वयं तो रोज आइना देखता हूँ और प्रयास करता हूँ अपना रूप सँवारने का जीतने का भी और प्रसन्नता से हारने का। मेरे लिए कई बार महत्त्वहीन हो जाता है बाजी मार जाना कई बार समझ में आता है आदमीयत का सही अर्थ…

"मैं डरता हूँ"

मेरे लिए खास हरदम हो

मेरा आभास हरदम ही, मेरे लिए खास हरदम हो हवाओं में फ़िज़ाओं में अलग एहसास हरदम हो ज़िन्दगी में बँधी है डोर जबसे अपने ज़ज़्बातों की तुम मेरी साँस हरदम हो, मेरा विश्वास हरदम हो। ***** केशव मोहन पाण्डेय *****

"मेरे लिए खास हरदम हो"

सीढ़ी

आदमी मंजिल तक सीढ़ियों से जाता है , सीढ़ी साधन हैं लक्ष्य प्राप्ति का, मगर स्वयं करना है कदम उठाने का उद्यम जाने के लिए मंजिल तक। ——- – केशव मोहन पाण्डेय

"सीढ़ी"

पाषाण-खंड

अचल से टूटा पाषाण बेहद खुरदुरा नुकीला और बेढब होता है नहीं रुचता आँखों को चुभता है पाँवों में रोड़ा होता है रास्ते का। समय की मार से बहकर अनुभव की धारा में रगड़ खाकर सत्यता के दो पाटों बीच बेहद खुरदुरा नुकीला और बेढब पाषाण-खंड चिकना हो जाता है आँखों को पाँवों को खूब भाता है और सजाता है रास्ते को। ** केशव मोहन पाण्डेय **

"पाषाण-खंड"