जड़

मेरे भीतर बहती है एक नदी तुम्हें देखकर तरल भावों की कलकल निर्मल निरंतर और तुम हमेशा ही मौन होकर जड़ बना देती हो। ***** – केशव मोहन पाण्डेय

"जड़"

प्रेम

तुम्हारे स्वर में जब सुनता हूँ परिभाषा प्रेम की तब आँखें तरल हो जाती हैं कान सघन और जबड़े जैसे पत्थर के मैं भी तो हो जाता हूँ मूर्तिवत किंकर्तव्यविमूढ़ होकर। ***** – केशव मोहन पाण्डेय

"प्रेम"

मानसरोवर

समय क्या पूछना आलिंगनबद्ध युगल से प्रश्न कैसा जीवन की आपाधापी का प्रेम में निबद्ध होने पर एकात्म होने से कहाँ अवकाश है दुनियावी प्रपंचों के लिए। पर अगर अधूरा है विश्वास तब निश्चय ही अस्तित्व-शून्य है प्यार परिभाषा उसकी और पावनता मानसरोवर की किसी के देवत्व के लिए। ***** – केशव मोहन पाण्डेय

"मानसरोवर"

वर्षों बाद भी ….

टूटते  हैं कई धागे नेह के हो के तार-तार। वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से तू ही मेरा घर-द्वार। स्मृति तेरे दीप्त नयन की हर क्षण उद्वेलित कर जाती सच कहता सौगंध तेरी तू पल में विपदा हर जाती तूने सजा दी मेरी दुनिया चहूँ ओर बरसे प्यार। वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से तू ही मेरा घर-द्वार। बंजर मन को स्नेह -उर्मि से सरस-सरल कर डाले तुम मीत! मिताई की मरहम से दूर किए…

"वर्षों बाद भी …."

परवरिश

एक सामान्य परिवार से होकर भी उद्भव जी ने अपने कर्मों से खूब नाम, यश, प्रतिष्ठा कमायी। क्षेत्र क्या, पूरे मंडल में कोई सामाजिक, साहित्यिक या बौद्धिक कार्य हो रहा हो, तो उसमें उद्भव जी निश्चित ही रहते हैं। उनकी महति भूमिका भी होती है। उद्भव जी ने शहर में रहकर बेटे प्रेम और बेटी प्रभा को उच्च शिक्षा दी। बेटी को एक एन आर आई इंजीनियर से व्याह दिया। अब बेटी भी अमेरिका में…

"परवरिश"

हे माँ शारदे!

हे माँ शारदे! एक वर दे तू। अंध हृदय में ज्योति कर दे तू।। अगम अगोचर महिमा तेरी मैं खल कामी दुःख की ढेरी देरी करो ना विद्या दायिनी दुःख दरद सारी दर दे तू।। अमल कमल सा मेरा मन हो सहज सदाचारी जीवन हो मन हो कभी कलुष से आकुल कलुष सदा मेरा हर दे तू।। रस-छंद-बंधन मैं नहीं जानूँ तेरे समक्ष माता जिद्द ठानूं मानूँ कि कुछ अच्छा लिख लूँगा कल्पना का अक्षय…

"हे माँ शारदे!"

भारत देश महान

जिसके कण-कण बसा हुआ है ऋषि-मुनियों का ज्ञान वह है भारत देश महान वह है अपना देश महान। जड़-जंगम की महिमा न्यारी पूजी जाती हैं नदियाँ सारी पादप-पुहुप में प्रभु बसते हैं पाहन की प्रभुता है भारी जिसकी रक्षा में जन्मे यहाँ अनगिनत भगवान वह है भारत देश महान वह है अपना देश महान। भले उष्णता से तप्त धरा हो आसमान धरती पे गिरा हो ठण्ड गलाये अस्थि-पंजर को उदधि लाख लहरों से भरा हो…

"भारत देश महान"

नदी हत्यारिन होती जा रही है

उफनती आस ले पानी और गतिशीलता विश्वास तोड़ने सी सोच जंगल उजाड़ने सी संघर्ष पेड़ काटने सी सोच में डूबी प्रदूषण सी आकण्ठ नदी हत्यारिन होती जा रही है और बदले की आग में नहीं पहचान रही है दोषी और निर्दोषी कौन। यूँ ही नहीं बदलती नदी अपना स्वरुप बदलती रहती है बहती नदी मानवीय चरित्र सी अपना रूप और समझ नहीं पाते हम कि नदी भी हमारे साथ राजनीति करती है आने वाले समय…

"नदी हत्यारिन होती जा रही है"

मोहे दरश करा दो मोहन

मोहे दरश करा दो मोहन। निज प्रतिबिम्ब दिखा दो प्यारे, मेरे मन के मुकुरन।। मोहे दरश करा दो मोहन। मेरे मन के प्रेम लहर में अंग-अंग डूब जाये तुम ही कहो जग याद करूँ कैसे, जो तू ही रूठ जाये श्याम-सलोने सुरतिया पर, वारूँ शत-शत जीवन।। मोहे दरश करा दो मोहन। कर कृपा मुझपर हे मालिक एक दिन मेरी सुधि ले लो दया-दृष्टि देकर दुःख दर दो, ऐसे ना आस से खेलो दरश को तरसे…

"मोहे दरश करा दो मोहन"

‘साहित्य साधना है,व्यसन नहीं’

सजग चेतना वालों में सिसृक्षा का बीज बोने का निरंतर काम करने वाले साहित्यकार श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव अर्थात रूद्र देव नारायण श्रीवास्तव का जन्म 10 दिसंबर 1939 को ग्राम बैरिया, नन्दा छपरा, रामकोला, जनपद कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया परन्तु रचनाएँ हिंदी में करने लगे। उन्होंने लोकमान्य इंटर कालेज, सेवरही कुशीनगर (उत्तर-प्रदेश) से प्रधानाचार्य पद से अवकाश लिया है। उनकी रचनाओं की धार बहुत ही तीक्ष्ण होती…

"‘साहित्य साधना है,व्यसन नहीं’"