सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा ‘हिन्दी दिवस समारोह’ का आयोजन

साहित्य, कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध संस्था ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ द्वारा 14 सितम्बर को श्री हंस सरस्वती पुस्तकालय, राजनगर पार्ट – एक, पालम, नई दिल्ली में ‘हिन्दी दिवस समारोह’ का आयोजन किया गया । यूं कहें कि उक्त कार्यक्रम से ही संस्था कि गतिविधियों की शुरुआत की गई जिसमे एक परिचर्चा व कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया । उक्त अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष व श्रेष्ठ साहित्यकार डॉ अशोक लव ने कार्यक्रम…

"सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा ‘हिन्दी दिवस समारोह’ का आयोजन"

चींटी रानी

चींटी रानी- चींटी रानी भोली भाली बड़ी सयानी छोटे-छोटे कदमों वाली रंग-रूप में छोटी-काली चलती जाती मिलजुल कर बिना डरे, होके बेफिकर चलना ही उसकी कहानी है चलने से ही तो ज़िंदगानी है — केशव मोहन पाण्डेय

"चींटी रानी"

हिंदी से कैसा द्वेष?

राग-रंग की भाषा हिंदी सक्षम-अक्षम की आशा हिंदी हिंदी सबकी शान है हिंदी से हिन्दुस्तान है मेरे गाने से क्योंकर क्लेश है? हिंदी फैली दूर तलक ईर्ष्या -द्वेष क्यों नाहक इसका अपना इतिहास पुरातन पूजता रहता इसको जन-मन विस्मित सारा परिवेश है। हिंदी ने किसी से बैर न माना जो आया उसे अपना जाना सबको भाई-बंधू जानती रंग-रूप का भेद न मानती इसकी विशेषता ये विशेष है। हिंदी से कैसा द्वेष है? — केशव मोहन…

"हिंदी से कैसा द्वेष?"

प्यार की चाहत

सविता दिखने में बहुत सामान्य थी और उसके पति रवि हर प्रकार से आकर्षक। आई टी प्रोफेशनल होने के कारण व्यक्तित्व और वेतन, दोनों आकर्षक था। रवि के पास सबकुछ होने के बाद भी समय का अभाव था। रवि की दिनचर्या भाग-दौड़ की थी। परिवार को व्यक्तित्व और वेतन से अधिक समय की इच्छा होती है। रवि के इस जीवन से सविता ने अनुभव किया कि ‘वह उसे प्यार नहीं करता। हो न हो, उसकी…

"प्यार की चाहत"

आदमी होने के नाते

मैं बियाबान में भी लेकर चलता हूँ अपना परिवार गाँव अपना शहर और देश के साथ ही दुनिया अपनी आदमी होने के नाते। और भीड़ में भी मैं नहीं सिमट पाता अपने आप में निरंतर कोशिश करता हूँ परिवार से जुड़े रहने का नहीं उजड़ता गाँव ना ही शहर और देश को जलाता हूँ किसी और दुनिया के लिए आदमी होने के नाते। मेरा आदमी होना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि रहना इस धरती…

"आदमी होने के नाते"

मेरे बाबूजी

खंभा दीवार नींव थे घर के मेरे बाबूजी रूप थे हुनर के। उनमे थी सबको मिलाने की चाहत मरी धरती को जीलाने की चाहत दीदी की आशा भैया की उम्मीदें अम्मा की सजने-सजाने की चाहत, भीतर मोम मगर बाहर पत्थर थे।। गिनते न पैसा अतिथि के सम्मान में बड़ा सा मन था उस पतली सी जान में चाहता रहा मैं उन्हें जान पाऊँ पर कैसे घूमूँ पूरे आसमान में आधा साहस, आधा मेरा डर थे।।…

"मेरे बाबूजी"

महान मानव

अपने अथक मेहनत के दम पर निरन्त प्रगति करता मानव रोज नए इतिहास लिख रहा है और सीख रहा है नित नए ज्ञान-विज्ञान रोज बनना चाहता है महान, अति-महान। आज की प्रगति देखकर विश्वास नहीं होता कभी इतिहास के उन अशआरों पर जब कहा जाता है – आदमी जंगली था नंग-धड़ंग रहता था न खाने का सलीका न था बोलने-चलने का शऊर आदमी बिलकुल बर्बर था तब। तब नदी, पहाड़, पेड़, बादल चाँद-सूरज पशु-पक्षी सबसे…

"महान मानव"

महादेव

केवल पर्वत पर विराजने से टूटी झोपड़ी में वास करने से भांग-धतूरे खाने से गंगा को शरण देने से गरल पान करने से भूतादि गणों को साथ रखने से मृग-छाला पहनने से बदन में भष्म लेप करने से और त्रिनेत्र रखने मात्र से ही कोई महादेव नहीं बन जाता महादेव बनते हैं शिव कि वे अपरिमित शक्ति के सागर हैं कुछ भी असंभव नहीं है उनके लिए फिर भी विराजते हैं पर्वत पर स्वर्ग का…

"महादेव"

सबकी सुनते हैं भगवान शिव

आज महाशिवरात्रि है। हिंदुओं का प्रमुख त्योहार। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। कहा जाता है कि भोलेशंकर राम नाम के रसिक हैं। शमशान घाट एवं वहाँ जलने वाले मुर्दे की भस्म को शरीर में धारण करने वाले भोलेशंकर पूर्ण निर्विकारी हैं। उन्हें विकारी मनुष्य पसंद नहीं हैं। कहा यह भी…

"सबकी सुनते हैं भगवान शिव"

काठ की गाड़ी सी ज़िन्दगी

पहिया है इंजन नहीं है गतिशीलता नहीं है जड़वत पड़ी रहती है ज़िन्दगी काठ की गाड़ी सी सुन्दर सुडौल आकर्षक भी। जब इंजन नहीं है गतिशीलता नहीं है तब पहिया-युक्त जड़ बनी रहती है ज़िन्दगी। पुरजोर दम लगाकर धक्का देना है आगे बढ़ाना है गतिशील बनाना है और खुद को करना है आभास इंजन होने का नहीं तो सड़ जायेगी जिंदगी काठ की गाड़ी सी पड़े-पड़े एक ही ठाँव। ********* – केशव मोहन पाण्डेय

"काठ की गाड़ी सी ज़िन्दगी"