मेरे गाँव की धरती

मेरे गाँव की धरती देती तरह-तरह के फूल।। कुछ हैं लंबे, कुछ हैं नाटे सोंधी मिट्टी से खुशबू बाँटे हरे पत्ते में कुछ हैं नीले रंग-रंगीले बैजनी सजीले मोटी-पतली पंखुड़ी वाले कुछ में हैं तीखे शूल। मेरे गाँव की धरती देती तरह-तरह के फूल।। फूल सुहाने अनुबंध लिए हैं छोटे हैं पर सुगंध लिए हैं इतराते हैं डाल-डाल पर अच्छे बूरे सभी हाल पर फैले खेत में दूर तलक हैं मन मोहते समूल। मेरे गाँव…

"मेरे गाँव की धरती"

संभवामि युगे-युगे

भगवान श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुष लीला अवतार कहा गया है। उनका लीलामय जीवन अनके प्रेरणाओं व मार्गदर्शन से भरा हुआ है। उनकी दिव्य लीलाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तार से किया गया है। उनका चरित्र मानव को धर्म, प्रेम, करुणा, ज्ञान, त्याग, साहस व कर्तव्य के प्रति प्रेरित करता है। उनकी भक्ति मानव को जीवन की पूर्णता की ओर ले जाती है। भाद्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को चारों ओर कृष्ण जन्म को उत्सव…

"संभवामि युगे-युगे"

अगर मन तेरा पावन हो

मेरी माँ रोज कहती थी, जो अब जज्बात में रहती। अगर मन तेरा पावन हो तो गंगा परात में रहती। संभल के बोलना लल्ला, बड़ी ताक़त है बोली में – गरल तो भर गया सबमें है सुधा भी बात में रहती।। ————- – केशव मोहन पाण्डेय

"अगर मन तेरा पावन हो"

मैं मरा नहीं हूँ

मुझे विश्वास है मैं मरा नहीं हूँ और मरूँगा भी नहीं ये अलग बात है कि कीचड़ के किनारे खड़ा होकर पत्थर नहीं मरूँगा कीचड़ में उसमे उगते कमल को दूर से ही प्रणाम करूँगा होता है तो हो जाए पथांतर मैं मरूँगा नहीं, अपना काम करूँगा। जी हाँ, मुझे रिश्ते नहीं चाहिए मेरा पीठ थपथपाने के लिए परंतु नहीं रहूँगा साथ तुम्हारे केवल शोषित होने के लिए भी। मुझे घृणा है तुमसे तुम्हारे व्यापार…

"मैं मरा नहीं हूँ"

सुन्दर दिन-रात

फूल फूल सुन्दर लगे, सुन्दर डाल व पात। मन में खुशियाँ हो भरी, तो सुन्दर दिन-रात।। 1 ठहरे जल का मोल क्या, बहता पाये मान। चलने वाले का सदा, होता रहा जहान।। 2 पत्थर गिरा पहाड़ से, तेज नुकीला रूप। घिसते-घिसते हो चला, चिकना चारु स्वरुप।।3 एक पत्र का मोल क्या, जो अलग तना, शाख। अलग-अलग जो हो गए, मिल जाते सब राख।।4 पादप पंखुड़ी पुहुप, प्रीति रीति अनमोल। मौन-मौन ही गंध दे, बोले न…

"सुन्दर दिन-रात"

बाक़ी जग वाले कह लेंगे

   सजग चेतना वालों में सिसृक्षा का बीज बोने के लिए निरंतर तत्पर श्री आर. डी. एन. श्रीवास्तव अर्थात रूद्र देव नारायण श्रीवास्तव का जन्म 10 दिसंबर 1939 को ग्राम बैरिया, नन्दा छपरा, रामकोला, जनपद कुशीनगर में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया परन्तु रचनाएँ हिंदी में करने लगे। उन्होंने लोकमान्य इंटर कालेज, सेवरही से प्रधानाचार्य पद से अवकाश लिया है। उनकी रचनाओं की धार बहुत ही तीक्ष्ण होती हैं। वे अपने अंदाज़…

"बाक़ी जग वाले कह लेंगे"

सत्य को लकवा नहीं मारा

सत्य को लकवा नहीं मारा है दलित दमित समय के पाषाण-खण्ड से और उन्मत्त है असत्य कर रहा अट्टहास मद में विजय के घमंड से। सत्य चाहे कितना भी हो विचलित गाये असत्य चाहे कितना भी स्व-शौर्य गीत समय आने पर सदा तूर्य लहराया सत्य के विजय का गाथा बनता रहा असत्य महा-हार का क्षय का। मानता हूँ हार जाता हूँ कहीं मैं सिद्ध नहीं कर पाता कितना हूँ सही मैं और कदाचित मौन होता…

"सत्य को लकवा नहीं मारा"

समय के साथ कदम मिलाती हिंदी

     समाजशास्त्र के अनुसार गतिशीलता से अभिप्राय व्यक्ति का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने से होता है। जीवविज्ञान में ऊर्जा का प्रयोग करके स्वयं को जगह-से-जगह हिला पाने की क्षमता को गतिशीलता कहते हैं। जब एक स्थान से व्यक्ति दूसरे स्थान को जाता है तो उसे हम साधारणतया आम बोलचाल की भाषा में गतिशील होने की क्रिया मानते हैं। जीवन के रूप में हम जिसे भी जानते हैं, उसमें गति निहित है।…

"समय के साथ कदम मिलाती हिंदी"

गुरदयाल सिंह का साहित्य जीवन-संघर्ष का उपन्यास

                                         पंजाबी साहित्यकार गुरदयाल सिंह से मेरा परिचय बहुत पुराना नहीं है। जब मैं हिंदी शिक्षण करने लगा तब उनकी संस्मरणात्मक कथा ‘सपनों के से दिन’ के माध्यम से उनके साहित्यकार रूप से मिला। मिला तो वे अपने लगने लगे। अपने लगे तो कभी लगा ही नहीं कि वे पंजाबी लेखक हैं। अपनी इस बात की…

"गुरदयाल सिंह का साहित्य जीवन-संघर्ष का उपन्यास"

मेरा गाँव बदल गया है 

  लगभग तीन-चार साल बाद अपने गाँव, अपने जन्म-स्थान जाने का अवसर प्राप्त हुआ। निर्णय यह हुआ कि इस बार हम साइकिल से चलेंगे। मेरा वजन अब पहले जैसा नहीं रहा। 55 किलो की सीमा पार करके 75-80 किलो का भारी-भरकम बंदा हो गया हूँ। मेरे पास पैंडिल-मार द्विचक्र वाहिनी (साइकिल) तो है नहीं, तथा गाँव के सौंदर्य और ममत्व भरे मिट्टी में द्वेष और तिकड़म का घिनौना रूप देखा हूँ, तो कोई अधिक रुचि…

"मेरा गाँव बदल गया है "