तेरे-मेरे बीच में

तेरे-मेरे बीच में, ऐसा हो विश्वास। होकर दूर एक लगें, जैसे भू-आकाश।।1 तेरे-मेरे बीच में, रिश्तों की है गाँठ। अपनी-अपनी आँख से, दुनिया पढ़ती पाठ।।2 सपने आँखों में लिए, धरती पर हो पाँव। बसता उसके मन सदा, खुशियों वाला गाँव।।3 चलते रहना काम है, है आराम हराम। बनते चलने से सदा, सारे बिगड़े काम।।4 सुन्दर सारा जगत है, सुन्दर शशि-दिनमान। सबसे सुन्दर मनुज है, सकल गुणों की खान।।5 ——— – केशव मोहन पाण्डेय

"तेरे-मेरे बीच में"

कैसे-कैसे लोग हैं

कैसे-कैसे लोग हैं, कैसी उनकी बात। सौंपे कोई सब यहाँ, कोई करता घात।।1 सारी दुनिया ढूँढती, खुशियों का अम्बार। सारी दुनिया भूलती, अपना ही घर-बार।।2 फैला सारे जगत में, छल-छद्म-व्यभिचार। लगता सारे जगत में, संजीवन सा प्यार।।3 संबंधों के दीप में, हो यह दिव्य प्रकाश। अँधियारा छल का मिटे, विकसित हो विश्वास।।4 संबंधों की भीड़ से, अच्छे हैं दो-चार। वैसे तो सारा जगत, है अपना परिवार।।5 ——— – केशव मोहन पाण्डेय

"कैसे-कैसे लोग हैं"

झूले पड़े फुहार के

झूले पड़े फुहार के, बादल दल के बाग। कजरी कोयल गा रही, बढ़ा रही अनुराग।।1 धरती धानी हो गई, सावन का पा प्यार। प्रियतम अंबर कर रहे, बार-बार मनुहार।।2 सावन सुख की गागरी, धन का ले भण्डार। लहराती वर्षा लिए, आया धरती द्वार।।3 सावन आने से बने, जीवन सुख-सौगात। सुभग सलोना दिन लगे, रसिक हो गई रात।।4 धरती विहसी देख के, सावन लगा फुहार। सुखद हो गई जिंदगी, पाकर माँ का प्यार।।5 —— – केशव…

"झूले पड़े फुहार के"

मैंने दाऊद को देखा है

हुड्डा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन गुड़गाँव में ब्लू लाइन मेट्रो का अंतिम पड़ाव तो था ही, अब इसका स्वरूप एक शाॅपिंग माॅल जैसा हो गया है। कबाब एक्सप्रेस से लेकर फूड प्वाइंट और न जाने किस-किस तरह की रेस्तरां और शाॅपिंग प्वाइंट खुल गए हैं। स्टेशन पर हमेशा आने-जाने वालों का ताँता लगा रहा है। ढाई बजे के आस-पास भी मेट्रो में यहाँ से इतनी भीड़ चलती है कि सबको बमुश्किल बैठने का स्थान मिलता…

"मैंने दाऊद को देखा है"

माँ की थाप और लोरी

माँ अपने बच्चे को थपकियाँ देकर सुलाती है। बच्चे के शरीर पर माँ की थाप ही केवल नहीं पड़ता। वह थपकियाँ देते समय कुछ गुनगुनाती भी है। माँ द्वारा उस गुनगुनाहट में लय की प्रधानता होती है। वह लय किसी प्रतिस्पर्धा या किसी उत्सव का नमूना नहीं होता। माँ की ममता में सिक्त थपकियों का संघाती होता है। थपकी देकर गाये जाने वाले गीतों को लोरी कहते हैं। लोरियों की परंपरा चिर-प्राचीन है। इनकी प्राचीनता…

"माँ की थाप और लोरी"

पारंपरिक भोजपुरी गीतों में वैवाहिक-विधान

हिन्दू धर्म में सद्-गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के संभ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन संभ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा…

"पारंपरिक भोजपुरी गीतों में वैवाहिक-विधान"

भोजपुरी लोकगीतों में नारी की प्रासंगिकता

भारतीय संस्कृति में पूरी तरह से विविधता देखी जाती है। यह विविधता भोजपुरी की विशिष्टता बन जाती है। अलग पहचान बन जाती है। यहीं विविधता तो इस संस्कृति की विशिष्टता है। इसे किसी निश्चित ढ़ाँचे में नहीं गढ़ा जा सकता। इस बलखाती अल्हड़ नदी को किसी बाँध से नहीं घेरा जा सकता। यह तो उस वसंती हवा सी स्वतंत्र है जो अपनी ही मानती है। इसे किसी दिशा-निर्देश का अर्थ नहीं पता। इसका कोई गुरू…

"भोजपुरी लोकगीतों में नारी की प्रासंगिकता"

कृषि-कार्यों से प्रेरित है नागपंचमी

    जब भी कोई पर्व-त्योहार, पूजा-पाठ का अवसर आता है तो मुझे बचपन की यादें आने लगती हैं। सावन में माँ की याद आते ही बिल्व-पत्र पर चंदन के लेप से राम-राम लिखकर शिव जी की पूजा करना, सावनी सोमवार का व्रत और फिर श्रावणी शुक्लपक्ष की पंचमी को नामपंचमी। नागपंचमी का कुछ अलग ही उत्साह होता था तब। सुबह ही गाय के गोबर और पीले सरसों से घर के चारों ओर घेरा बनाया…

"कृषि-कार्यों से प्रेरित है नागपंचमी"

वो जो छोर देख रहे हो

वो जो छोर देख रहे हो वही मिलती है धरती आकाश से वही सपने सच होते है और हक़ीक़त गलबाँही करती है सपनों को। वो जो छोर देख रहे हो वही है ढेरों सफलताएँ परंतु वहाँ जाने के लिए पार करना पड़ता है समय के पहाड़ को गुजरना पड़ता है यथार्थ के जंगल से अनुभव के दुर्गम रास्ते से होकर कई बार तो निरंतरता की सपाट जमीन मिल जाती है और कई बार चुनौती देती…

"वो जो छोर देख रहे हो"

बार-बार ढूँढता हूँ

माँ पैबंद जोड़ती थी रिश्तों में पिता अनुबंध जीते थे किश्तों में और दोनों मिलकर सपनों को पालते रहे सिंचते रहे सजोते रहे और जीवंत करने के लिए सपने मारते रहे मन पालते रहे संतति-धन। माँ जीवन-पर्यन्त आस पिरोती रही आँखों का मोती संभाल कर साँसों के धागे में ले उम्मीदों की सुई और जीती रही बन के छुईमुई। पिता संस्कार बोते थे समरसता की जमीन पर निष्ठा की कुदाल से काट-काट बोझिल कुंठा को।…

"बार-बार ढूँढता हूँ"