हिन्दी में आदिवासी लेखन का परिदृश्य

संस्कृत के काव्यशास्त्रीय प्रतिमानों से होते हुए मुक्त छंद में रच बस चुकी हिन्दी कविता आज भी अपने कला-रूप  को लंेकर सजग है। आज भी दलित लेखकों की प्रभावी कविता को वह जगह नहीं मिली जिसकी वह हकदार है। बिम्ब, प्रतीक, वाग्मिता, छंद-लय की माँग आज भी हिन्दी  कविता में अपेक्षित है। किन्तु हिन्दी के वर्तमान पर विमर्शात्मक विविध स्वरों की दस्तक हो चुकी है। दलित चिंतन को आधार बनाकर लिखने वाले कवियों ने स्वतंत्रता,…

"हिन्दी में आदिवासी लेखन का परिदृश्य"

माँ

थके हारे तन मन को गोदी में लिटा सहला दूँ l माँ ! आ , आज लोरी गाकर तुझे , मैं सुला दूँ l तेरी चिन्ता ,दुख – सुख काँधे का बोझ अपने काँधों पे उठा लूँ आ , तुझे मैं सुला दूँ l सुनती नहीं बिल्कुल भी करती अपने मन की डाँट लगा चुप करा दूँ आ ! तुझे मैं सुला दूँ l तेरे चेहरे की झुर्री को काँपती धुरी को जीवन बिन्दु से…

"माँ"

तम्बाकू निषेध से जागरूकता लाने का प्रयास करें

  तम्बाकू सेवन से जन्मे अनेक रोगों से बचने हेतु सलाह दी जाना चाहिए । एक जानकारी के मुताबिक बढ़ती लत कारण मुख केंसर के मरीजो की संख्या  देश मे लगभग ५० लाख है |घातक रसायन निकोटिन तम्बाकू  मे पाया जाता है| स्वैच्छिक संगठन एवं सामाजिक संस्थाए  तम्बाकू निषेध दिवस (३१-मई ) पर अपना राग अलापते शायद थक सी गई है | आज भी स्थितिया वेसी ही बनी हुई है।व्यसन मुख्य  परामर्श केंद्र भी जागरूकता लाने  का प्रयत्न कर रही है…

"तम्बाकू निषेध से जागरूकता लाने का प्रयास करें"

सबकी सुनते हैं भगवान शिव

आज महाशिवरात्रि है। हिंदुओं का प्रमुख त्योहार। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। कहा जाता है कि भोलेशंकर राम नाम के रसिक हैं। शमशान घाट एवं वहाँ जलने वाले मुर्दे की भस्म को शरीर में धारण करने वाले भोलेशंकर पूर्ण निर्विकारी हैं। उन्हें विकारी मनुष्य पसंद नहीं हैं। कहा यह भी…

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वृद्धावस्था की पीड़ा

वृद्धावस्था उस अवस्था को कहा गया है जिस उम्र में मानव-जीवन काल के समीप हो जाता है। वृद्ध लोगों को विविध प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोग लगने की अधिक सम्भावना होती है। उनकी समस्याएँ भी अलग होती हैं। वृद्धावस्था एक धीरे-धीरे आने वाली अवस्था है जो कि स्वभाविक व प्राकृतिक घटना है। वृद्ध का शाब्दिक अर्थ है बढ़ा हुआ, पका हुआ, परिपक्व। वर्तमान सामाजिक जीवन-शैली में वृद्धों के कष्टों को देखकर मन में हमेशा…

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वर्तमान समय में राम की प्रासंगिकता

महर्षि वाल्मीकि के संस्कृत साहित्य से लेकर नरेश मेहता के ‘संशय की एक रात’ तक और वर्तमान के अन्य साहित्यकारों ने भिन्न-भिन्न उपमाओं, अलंकारों, उद्भावनाओं, कथोपकथनों, कथा-प्रसंगों आदि से राम के चरित्र को वर्णित किया है। राम कथा को लोक मानस तक संप्रेषित करने का प्रयास किया है। हरिवंश पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण, अध्यात्म रामायण, आनंद रामायण, भृशुंडी रामायण, कंब रामायण आदि ग्रंथों द्वारा भी राम कथा का व्यापक प्रचार हुआ है।…

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गणेश चौथ पर भेड़ा काटना

माघ मास का गणेश चौथ। गणपति बप्पा मोरया कह कर मूर्ति विसर्जित करने वाला नहीं, माघ के कृष्ण पक्ष का गणेश चतुर्थी व्रत। थोड़ा क्या, स्नातक पास करने और परास्नातक में लोक-साहित्य पढ़ते समय पता चला कि इस व्रत को संकट चौथ भी कहा जाता है। संकट चौथ का यह त्योहार माघ के कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है। इतना तो मुझे लड़कपन में ही पता था। एक अलग उत्साह के साथ प्रतीक्षा किया जाता…

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माँ की थाप और लोरी

माँ अपने बच्चे को थपकियाँ देकर सुलाती है। बच्चे के शरीर पर माँ की थाप ही केवल नहीं पड़ता। वह थपकियाँ देते समय कुछ गुनगुनाती भी है। माँ द्वारा उस गुनगुनाहट में लय की प्रधानता होती है। वह लय किसी प्रतिस्पर्धा या किसी उत्सव का नमूना नहीं होता। माँ की ममता में सिक्त थपकियों का संघाती होता है। थपकी देकर गाये जाने वाले गीतों को लोरी कहते हैं। लोरियों की परंपरा चिर-प्राचीन है। इनकी प्राचीनता…

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पारंपरिक भोजपुरी गीतों में वैवाहिक-विधान

हिन्दू धर्म में सद्-गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के संभ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन संभ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा…

"पारंपरिक भोजपुरी गीतों में वैवाहिक-विधान"

भोजपुरी लोकगीतों में नारी की प्रासंगिकता

भारतीय संस्कृति में पूरी तरह से विविधता देखी जाती है। यह विविधता भोजपुरी की विशिष्टता बन जाती है। अलग पहचान बन जाती है। यहीं विविधता तो इस संस्कृति की विशिष्टता है। इसे किसी निश्चित ढ़ाँचे में नहीं गढ़ा जा सकता। इस बलखाती अल्हड़ नदी को किसी बाँध से नहीं घेरा जा सकता। यह तो उस वसंती हवा सी स्वतंत्र है जो अपनी ही मानती है। इसे किसी दिशा-निर्देश का अर्थ नहीं पता। इसका कोई गुरू…

"भोजपुरी लोकगीतों में नारी की प्रासंगिकता"