मणिकर्णिका की ओर हिंदुस्तान

ना ऊह ना आह था उसका हाथ तुम्हारे पीठ पर या कंठ पर थपथपाया जा रहा था या टेटूआ दबाया जा रहा था जब शब्द और अर्थ का संबंध तोड़ा जा रहा था कविताओं के मायने बदले जा रहे थे तब तुम कभी कहां थे ? अलगाए जा रहा था जब हिंदुस्तानी गर्भाशय से अंडाणु – शुक्राणु अच्छा बताओ तब तुम हिंदू बने या मुसलमान वो गिनती में कितने थे जिसे देख पा रही थी…

"मणिकर्णिका की ओर हिंदुस्तान"

दयाराम

बेशक तुम जश्न मनाओ, खुशियाँ बाँटो, बागों में , पहाड़ो में, पर तुम्हें पता है, नालियाँ साफ करते -करते , दम घूँट कर, नाली में मर गया, दयाराम। बेशक तुम जश्न मनाओ ,खुशियों बाँटो, बागों में पहाड़ों में, पर तुम्हें पता है, तुम्हारी साल भर पेट भरने के लिये, और अपने लिए दो दाने की जुगत में, ठंड से ठिठुर कर खेत में मर गया – दायराम। मगर उसके मुँह से मिला यूरिया , बयां…

"दयाराम"

सांसो बा हमार उधार

सांसो बा हमार उधार के कुछो बचल बा का खुलल आँखे लूटा गइनी शोर मचल बा का एक साँझ में हम रईस से फकीर हो गइनी कुछ रद्दी रहे बाचल तबो जेब कटल बा का जिन्नगी के किताब के पन्ना उ पलट देहलें लोग ताकता की पनन्वा बीचे फटल बा का उहे साज कहीं दूर से बाज रहल बा शायद जवन गीत रहे उ भइल आज गजल बा का कुछ ठंडा बयार देख बस चलल…

"सांसो बा हमार उधार"

जब बात और लगेगी

दिल को जब बात और लगेगी तब उधर भी  रात और लगेगी तुम समझते रहे बस खेल जिसे वो सारी  मुलाक़ात और लगेगी मुकम्मल होगी गर तेरी कोशिश तो मेरी भी शुरुआत और लगेगी चाँदनी मुखड़े से होती मीठी बातें तो सारी बिखरी खैरात और लगेगी रख दो जो जुल्फों को काँधे पर तो  तारों की बारात और लगेगी …………… सलिल सरोज कार्यकारी अधिकारी लोक सभा सचिवालय संसद भवन

"जब बात और लगेगी"

ऐसा मेरा प्यार

(दौहिक गीतिका) बाँध मत किसी बाँध से, रोक न मेरी धार। समय कभी सहला ज़रा, कर कठोर प्रहार।। चलना मेरा काम है, करना क्या आराम। चाहे जितना भी बढ़े, धरती का विस्तार।। कहने वाले कह रहे, मुझमे भरा घमंड। देखो दर्पण में जरा, खुद को भी तो यार।। मेरी दुनिया तुम सदा, मान या नहीं मान। मानेंगे इक दिन सभी, रहना तुम तैयार।। आँखों में तेरी छवी, मन में तेरा चित्र। साँसों का संगीत तुम,…

"ऐसा मेरा प्यार"

पूजा तेरे रूप की

(दौहिक गीतिका) चाहे कितना भी रखो, फूँक-फूँक के पाँव। बने खिलाड़ी खेलते, सारे अपना दाँव।। छल-छद्म-वैमनस्य सब, घर-घर बसते आज। शहरों से भी हो गए, खतरनाक अब गाँव।। रोटी ही जिसका खुदा, उसको क्या आराम। भूख से जब व्याकुल हुए, भूलते धूप-छाँव।। पूजा तेरे रूप की, करता मैं दिन-रात। पागल मन को प्यार में, मिलता मरहम-घाव।। मानव का है एक सच, बाकी सारा रोग। फिर भी इस संसार में, मन का नहीं लगाव।। **** केशव…

"पूजा तेरे रूप की"

उनके जैसा जगत में

सुख में दुःख में जो सदा, रखते रहते टेव। आते उनके रूप में, धरा-धाम पर देव।। नफ़रत हैं जो घोलते, दो लोगों के बीच। उनके जैसा जगत में, नहिं है कोई नीच।। मधुर-मधुर सी बात कर, चलते टेढ़ी चाल। उनके जैसा जगत में, नहिं कोई कंगाल।। बीच सभा में दे नहीं, जो खुद को सम्मान। उनके जैसा जगत में, नहीं अधम इनसान।। ** केशव मोहन पाण्डेय

"उनके जैसा जगत में"

मनचाहा मित्र

बाँध मत किसी बाँध से, रोक न मेरी धार। समय कभी सहला ज़रा, कर कठोर प्रहार।।1 जब हो जाता है कभी, भावों का अनुबंध। अजनबी से भी जुड़ता, जन्मों का संबंध।।2 चाहे करना और कुछ, हो जाता कुछ और। मानव जीवन में चला, जब भी गड़बड़ दौर।।3 जीवन बन जाता सदा, सुखद सुगंधित इत्र। मिल जाता सौभाग्य से, जो मनचाहा मित्र।।4 मेरी साँसें तुम बनो, तेरी मैं प्रतिश्वास। मेरी धड़कन जब रुके, तुमको हो आभास।।5…

"मनचाहा मित्र"

नयन बीच नित आये वर्षा

नयन बीच नित आये वर्षा काजल धो के बहाये वर्षा हर्ष-विषाद दोनों हैं साथी भाव-सुभाव स्नेह है थाती सिद्धि-असिद्धि के स्यन्दन चढ़ उमड़-घुमड़ पुनि आये वर्षा।। गरज गिरा गह्वर से निकले जैसे हिम हुलस नित पिघले गर्व राग का कर के अलाप मन के भाव जगाये वर्षा।। पीड़ा-कुंठा क्षण में बहाये स्वच्छ जीवन-राह बनाये धरा-हृदय का पूजक पागल क्षण-क्षण सरस जल जाए वर्षा।। ***** केशव मोहन पाण्डेय

"नयन बीच नित आये वर्षा"

चींटी रानी

चींटी रानी- चींटी रानी भोली भाली बड़ी सयानी छोटे-छोटे कदमों वाली रंग-रूप में छोटी-काली चलती जाती मिलजुल कर बिना डरे, होके बेफिकर चलना ही उसकी कहानी है चलने से ही तो ज़िंदगानी है — केशव मोहन पाण्डेय

"चींटी रानी"