देश का फ़ौजी

रोटी-सोटी, चाय-चपाती ये बड़े-बड़ों का खाना है, अपने लिए तो जल्दी से मैग्गी-सैगी बनवाना है। गार्डेन में जा कर मैं झूमूँ और झूला-झूलूँ खूब चॉकलेट-टॉफी ऐसे खाता कि नाक भी जाता डूब। मैं हूँ बच्चा, मन का सच्चा नहीं किसी से बैर। माँ-पापा की उँगली थाम के करना चाहूँ हरदम सैर। मम्मी का राजदुलारा हूँ सबके आँखों का तारा हूँ। सब कहते हैं जैसा भी हूँ मैं ही सबसे प्यारा हूँ। लाल-क़िले पर जाऊँगा मैं…

"देश का फ़ौजी"

कई बार

कई बार बिना वजह रोने का मन करता है अपने आप से ही खोने का मन करता है मन करता है उदास चेहरों पर हँसी खिलाने का बिछड़े जोड़ों को अंतर तक मिलाने का मन तो करता है उड़ता जाऊँ आकाश में जब भी मन उदास होता कई बार आना चाहूँ माँ तेरे ही पास में। कई बार एकाएक मुस्कुरा उठता हूँ अपनी बेवकूफी से जब मैं रूठता हूँ तुम जैसा कोई नहीं हक़ जताने…

"कई बार"

लड़ना होगा जंग

ऐसा ही होता है मौन का विलाप और शोर की क्रांति जैसे शांत है धरती बेटियों के नोचे जाने पर छिन्न-भिन्न किये जाने पर भी उनके अस्मत/वज़ूद को। और आह्लादित हो रहें है जननी को कलंकित करने वाले कायर अपने पुंसकत्व पर जो उदहारण बन रहे है नपुंसकता के। डरने लगी है हर बेटी हर जननी भी बेटी होने बेटी जनने से सदा-प्रसूता वसुधा भी। अगर डर गई जो मौन होती धरती/माँ बंजर हो जाये…

"लड़ना होगा जंग"

शरारत

विचित्र जीव हो तुम कई बार अनचाहे ही बजाने लगती हो यादों का ‘डोर बेल’ घुस आती हो दिल-ओ-दिमाग में और उदास चेहरे पर भी अंकित कर देती हो एक मुस्कान की शरारत। ———– – केशव मोहन पाण्डेय

"शरारत"

लड़की

लड़की चिड़िया बनकर उड़ान भरती जा रही है आकाश में और पंख मारती है अनंत छूने को । लड़की नदी की लहर बनकर बहती जा रही है विराट की ओर। लड़की किरण बनकर घेरती जा रही है – कवि-कल्पित स्थान को। लड़की स्त्री बनकर बरसती है नेह की बदली जैसी और, लड़की बन रही है सब कुछ। परन्तु लड़की आज भी नहीं बोल पा रही है ठीक से , लड़की, आज भी धरती बनकर बिछती…

"लड़की"

बाल-दिवस की शुभकामना

बाल-दिवस पर बाल मन को कर लें कुछ वाचाल। मन की बातें करें पुरानी बिना बजाए गाल। चाचा जी से चूरन ले लें चकमा दे दें चाची को, माँ की गोद-गलीचा बैठ दूर करें सारी उदासी को। पापा संग जा उछलें-कूदें सैर करें हम दुनिया की, इस गोली में रस कैसे आया ऑपरेशन करें बुनिया की। जाकर लेमचूस खरीदेंगे काका के दूकान की, जो हम बच्चों को कहते हैं सूरत हैं भगवान की। बाल-दिवस पर…

"बाल-दिवस की शुभकामना"

मैं कविता नहीं लिख पाता

मैं कैसे लिखूँ कविता कल्पनाओं के संसार की प्रेम के ऐतबार की मखमली सपनों की मेरे, सिर्फ मेरे अपनों की? क्योंकि जब चाहता हूँ लिखना कोई टीस उभार देता है मन को कुरेद जाता है और कर देता है छलनी उन काल्पनिक भावों को तब उगने लगते है सिर्फ बंजर यथार्थ चोट खाये सम्बन्ध झुक-झुककर किये गए अनुबंध जो अंकित हो आते हैं विचारों की शिला पर समय के दबाव से, दुखी हो जाता हूँ…

"मैं कविता नहीं लिख पाता"

जीवन आज भी है संघर्ष

आँख में आँसू मीठे-खारे जीवन में अवमूल्यन सारे नहीं हो सकते आदर्श जीवन आज भी है संघर्ष। संझा मैली गठरी लेकर पीर के आंगन आती है मेहनत से खा-पीकर फिर भी कुछ तो बचा के लाती है बैठ मुंडेरे चिंतित पाँखी कल क्या होगा गुन रही और चकोरी चाँद मिलन को तड़प-तड़पकर गाती है चैन की वंशी सुख का सितारा रोटी के आगे सब है बिसारा भुला मन हँसी-खुशी अमर्ष। जगह-जगह है गंगा ठहरी मार…

"जीवन आज भी है संघर्ष"

चलते जाना है

उठा-पटक यह जीवन है। अभिलाषा क्या सरल पथ की ? खुद खींचना है चलाना है, है सारथी-शून्य यह रथ भी। शापित-शून्य होकर भी धस जाता पहिया दलदल में, सुनना होता है गीता समय-कृष्ण से हर पल में। कुछ कठिनाई-द्यूत द्रौपदी-निष्ठा को निर्वस्त्र जो करने लगते हैं, शकुनी रिश्ते बन जाते है दुर्दिन-दुर्योधन के भाग्य जगते है। गंधारी-ज्ञान, पट्टी से अंधी हो जब स्वार्थ-सिद्धि में जीती है, कुंती-कर्म कठोर हो-होकर शील के पैबंद को सीती है।…

"चलते जाना है"