मुबारक हो सबको नया साल

अधर पर रहे अक्षय मुस्कान नयन में चहक भरा हो बिहान रहे न अब कोई खस्ता हाल। मुबारक हो सबको नया साल।। रोटी हो सबको उपलब्ध हृदय सबका सबसे संबद्ध प्रीति की सरिता सभी बहायें सभी से विनती करूँ करबद्ध द्वेष हिंसा है नहीं निदान करें सब इसका मिल समाधान नहीं हो किसी से किसी को मलाल। मुबारक हो सबको नया साल।। ऊर्वरा बढ़े धरती का रोज सभी रहें उत्सुक देने को भोज हो कैसे…

"मुबारक हो सबको नया साल"

स्मृतियाँ

कई बार मैंने अपनी कोमल अंगुलियों से पकड़कर खींची थी उनकी मूँछें, नन्हीं दँतुलियों से काटी थी नाक उनकी, दोनों पैरों पर बैठ कर खेला था ‘घुघुआ-माना’ पेट को मुलायम गलीचा समझ कई बार कूदा था, कानों को पकड़ कई बार नाखून धसाया, कई बार करता रहा सबकुछ फिर भी वे बाज़ार से लाते रहे ‘टाॅफी’ और ‘मिठाइयाँ’ उठाते रहे गोद में खिलाते रहे साथ में सुलाते रहे पास में, और एक दिन अकेले ही…

"स्मृतियाँ"

सागर

सागर रखता है असीमित नीर फिर भी देखकर चाँद को हो जाता अधीर उछलता भी है मचलता भी है कई बार मानव चित्त सा बडवाग्नि में जलता भी है मगर अपनी सीमा में सिमट जाता है कहाँ कभी बँट जाता है? जब कभी तोड़ता है सीमा सुनामी-सा किसी रूप में तब नहीं बच पाती उसकी गरिमा भी तो। ——– – केशव मोहन पाण्डेय

"सागर"

वो जो छोर देख रहे हो

वो जो छोर देख रहे हो वही मिलती है धरती आकाश से वही सपने सच होते है और हक़ीक़त गलबाँही करती है सपनों को। वो जो छोर देख रहे हो वही है ढेरों सफलताएँ परंतु वहाँ जाने के लिए पार करना पड़ता है समय के पहाड़ को गुजरना पड़ता है यथार्थ के जंगल से अनुभव के दुर्गम रास्ते से होकर कई बार तो निरंतरता की सपाट जमीन मिल जाती है और कई बार चुनौती देती…

"वो जो छोर देख रहे हो"

बार-बार ढूँढता हूँ

माँ पैबंद जोड़ती थी रिश्तों में पिता अनुबंध जीते थे किश्तों में और दोनों मिलकर सपनों को पालते रहे सिंचते रहे सजोते रहे और जीवंत करने के लिए सपने मारते रहे मन पालते रहे संतति-धन। माँ जीवन-पर्यन्त आस पिरोती रही आँखों का मोती संभाल कर साँसों के धागे में ले उम्मीदों की सुई और जीती रही बन के छुईमुई। पिता संस्कार बोते थे समरसता की जमीन पर निष्ठा की कुदाल से काट-काट बोझिल कुंठा को।…

"बार-बार ढूँढता हूँ"

मैं मरा नहीं हूँ

मुझे विश्वास है मैं मरा नहीं हूँ और मरूँगा भी नहीं ये अलग बात है कि कीचड़ के किनारे खड़ा होकर पत्थर नहीं मरूँगा कीचड़ में उसमे उगते कमल को दूर से ही प्रणाम करूँगा होता है तो हो जाए पथांतर मैं मरूँगा नहीं, अपना काम करूँगा। जी हाँ, मुझे रिश्ते नहीं चाहिए मेरा पीठ थपथपाने के लिए परंतु नहीं रहूँगा साथ तुम्हारे केवल शोषित होने के लिए भी। मुझे घृणा है तुमसे तुम्हारे व्यापार…

"मैं मरा नहीं हूँ"

सत्य को लकवा नहीं मारा

सत्य को लकवा नहीं मारा है दलित दमित समय के पाषाण-खण्ड से और उन्मत्त है असत्य कर रहा अट्टहास मद में विजय के घमंड से। सत्य चाहे कितना भी हो विचलित गाये असत्य चाहे कितना भी स्व-शौर्य गीत समय आने पर सदा तूर्य लहराया सत्य के विजय का गाथा बनता रहा असत्य महा-हार का क्षय का। मानता हूँ हार जाता हूँ कहीं मैं सिद्ध नहीं कर पाता कितना हूँ सही मैं और कदाचित मौन होता…

"सत्य को लकवा नहीं मारा"

मैं सूरज हूँ

कुण्ठा का कोहरा अज्ञानता का अंधकार पैबंदों के विचार और कूप-मुडुकी संसार में सूरज आते ही प्रकाश भर जाता है – मैं सूरज हूँ। मैं वह सूरज हूँ जिसे नहीं ढका जा सकता किसी गुट के बादल से नहीं बंद किया जा सकता चाशनी-युक्त संकीर्णता के डिब्बे में और ओढ़ाकर सम्मानों का चादर घेरा भी तो नहीं जा सकता किसी लक्ष्मण-रेखा से किसी रावण द्वारा हरण भी नहीं हो सकते मेरे विचार और कौन कस…

"मैं सूरज हूँ"