शरारत

विचित्र जीव हो तुम कई बार अनचाहे ही बजाने लगती हो यादों का ‘डोर बेल’ घुस आती हो दिल-ओ-दिमाग में और उदास चेहरे पर भी अंकित कर देती हो एक मुस्कान की शरारत। ———– – केशव मोहन पाण्डेय

"शरारत"

लड़की

लड़की चिड़िया बनकर उड़ान भरती जा रही है आकाश में और पंख मारती है अनंत छूने को । लड़की नदी की लहर बनकर बहती जा रही है विराट की ओर। लड़की किरण बनकर घेरती जा रही है – कवि-कल्पित स्थान को। लड़की स्त्री बनकर बरसती है नेह की बदली जैसी और, लड़की बन रही है सब कुछ। परन्तु लड़की आज भी नहीं बोल पा रही है ठीक से , लड़की, आज भी धरती बनकर बिछती…

"लड़की"

बाल-दिवस की शुभकामना

बाल-दिवस पर बाल मन को कर लें कुछ वाचाल। मन की बातें करें पुरानी बिना बजाए गाल। चाचा जी से चूरन ले लें चकमा दे दें चाची को, माँ की गोद-गलीचा बैठ दूर करें सारी उदासी को। पापा संग जा उछलें-कूदें सैर करें हम दुनिया की, इस गोली में रस कैसे आया ऑपरेशन करें बुनिया की। जाकर लेमचूस खरीदेंगे काका के दूकान की, जो हम बच्चों को कहते हैं सूरत हैं भगवान की। बाल-दिवस पर…

"बाल-दिवस की शुभकामना"

मैं कविता नहीं लिख पाता

मैं कैसे लिखूँ कविता कल्पनाओं के संसार की प्रेम के ऐतबार की मखमली सपनों की मेरे, सिर्फ मेरे अपनों की? क्योंकि जब चाहता हूँ लिखना कोई टीस उभार देता है मन को कुरेद जाता है और कर देता है छलनी उन काल्पनिक भावों को तब उगने लगते है सिर्फ बंजर यथार्थ चोट खाये सम्बन्ध झुक-झुककर किये गए अनुबंध जो अंकित हो आते हैं विचारों की शिला पर समय के दबाव से, दुखी हो जाता हूँ…

"मैं कविता नहीं लिख पाता"

जीवन आज भी है संघर्ष

आँख में आँसू मीठे-खारे जीवन में अवमूल्यन सारे नहीं हो सकते आदर्श जीवन आज भी है संघर्ष। संझा मैली गठरी लेकर पीर के आंगन आती है मेहनत से खा-पीकर फिर भी कुछ तो बचा के लाती है बैठ मुंडेरे चिंतित पाँखी कल क्या होगा गुन रही और चकोरी चाँद मिलन को तड़प-तड़पकर गाती है चैन की वंशी सुख का सितारा रोटी के आगे सब है बिसारा भुला मन हँसी-खुशी अमर्ष। जगह-जगह है गंगा ठहरी मार…

"जीवन आज भी है संघर्ष"

चलते जाना है

उठा-पटक यह जीवन है। अभिलाषा क्या सरल पथ की ? खुद खींचना है चलाना है, है सारथी-शून्य यह रथ भी। शापित-शून्य होकर भी धस जाता पहिया दलदल में, सुनना होता है गीता समय-कृष्ण से हर पल में। कुछ कठिनाई-द्यूत द्रौपदी-निष्ठा को निर्वस्त्र जो करने लगते हैं, शकुनी रिश्ते बन जाते है दुर्दिन-दुर्योधन के भाग्य जगते है। गंधारी-ज्ञान, पट्टी से अंधी हो जब स्वार्थ-सिद्धि में जीती है, कुंती-कर्म कठोर हो-होकर शील के पैबंद को सीती है।…

"चलते जाना है"

तपन बिन सूरज हुआ अधीर

तपन बिन सूरज हुआ अधीर।। हवा बावली शीत लहर सी वसनहीन पर टूटी कहर सी अलाव ठोंके ताल खैनी का बनकर कुशासन का नज़ीर।। कथा कहता कौआ सच्चा ज़िद्द पर बैठा पूरब बच्चा रवि-फल का सब बाट अगोरे ओढ़े घने कोहरे का चीर।। साँस को रोके सिसके कुँआ साँस से निकले मुँह भर धुँआ मूली-मिर्च के सउना-गंध से दोपहरी बन बैठी गंभीर।। कारण बिन कोई कार्य न होए सांध्य-सुबह सब मिलकर रोए सद्भाव बने सब…

"तपन बिन सूरज हुआ अधीर"

मुबारक हो सबको नया साल

अधर पर रहे अक्षय मुस्कान नयन में चहक भरा हो बिहान रहे न अब कोई खस्ता हाल। मुबारक हो सबको नया साल।। रोटी हो सबको उपलब्ध हृदय सबका सबसे संबद्ध प्रीति की सरिता सभी बहायें सभी से विनती करूँ करबद्ध द्वेष हिंसा है नहीं निदान करें सब इसका मिल समाधान नहीं हो किसी से किसी को मलाल। मुबारक हो सबको नया साल।। ऊर्वरा बढ़े धरती का रोज सभी रहें उत्सुक देने को भोज हो कैसे…

"मुबारक हो सबको नया साल"

स्मृतियाँ

कई बार मैंने अपनी कोमल अंगुलियों से पकड़कर खींची थी उनकी मूँछें, नन्हीं दँतुलियों से काटी थी नाक उनकी, दोनों पैरों पर बैठ कर खेला था ‘घुघुआ-माना’ पेट को मुलायम गलीचा समझ कई बार कूदा था, कानों को पकड़ कई बार नाखून धसाया, कई बार करता रहा सबकुछ फिर भी वे बाज़ार से लाते रहे ‘टाॅफी’ और ‘मिठाइयाँ’ उठाते रहे गोद में खिलाते रहे साथ में सुलाते रहे पास में, और एक दिन अकेले ही…

"स्मृतियाँ"