ऐसा मेरा प्यार

(दौहिक गीतिका) बाँध मत किसी बाँध से, रोक न मेरी धार। समय कभी सहला ज़रा, कर कठोर प्रहार।। चलना मेरा काम है, करना क्या आराम। चाहे जितना भी बढ़े, धरती का विस्तार।। कहने वाले कह रहे, मुझमे भरा घमंड। देखो दर्पण में जरा, खुद को भी तो यार।। मेरी दुनिया तुम सदा, मान या नहीं मान। मानेंगे इक दिन सभी, रहना तुम तैयार।। आँखों में तेरी छवी, मन में तेरा चित्र। साँसों का संगीत तुम,…

"ऐसा मेरा प्यार"

पूजा तेरे रूप की

(दौहिक गीतिका) चाहे कितना भी रखो, फूँक-फूँक के पाँव। बने खिलाड़ी खेलते, सारे अपना दाँव।। छल-छद्म-वैमनस्य सब, घर-घर बसते आज। शहरों से भी हो गए, खतरनाक अब गाँव।। रोटी ही जिसका खुदा, उसको क्या आराम। भूख से जब व्याकुल हुए, भूलते धूप-छाँव।। पूजा तेरे रूप की, करता मैं दिन-रात। पागल मन को प्यार में, मिलता मरहम-घाव।। मानव का है एक सच, बाकी सारा रोग। फिर भी इस संसार में, मन का नहीं लगाव।। **** केशव…

"पूजा तेरे रूप की"

नयन बीच नित आये वर्षा

नयन बीच नित आये वर्षा काजल धो के बहाये वर्षा हर्ष-विषाद दोनों हैं साथी भाव-सुभाव स्नेह है थाती सिद्धि-असिद्धि के स्यन्दन चढ़ उमड़-घुमड़ पुनि आये वर्षा।। गरज गिरा गह्वर से निकले जैसे हिम हुलस नित पिघले गर्व राग का कर के अलाप मन के भाव जगाये वर्षा।। पीड़ा-कुंठा क्षण में बहाये स्वच्छ जीवन-राह बनाये धरा-हृदय का पूजक पागल क्षण-क्षण सरस जल जाए वर्षा।। ***** केशव मोहन पाण्डेय

"नयन बीच नित आये वर्षा"

हिंदी से कैसा द्वेष?

राग-रंग की भाषा हिंदी सक्षम-अक्षम की आशा हिंदी हिंदी सबकी शान है हिंदी से हिन्दुस्तान है मेरे गाने से क्योंकर क्लेश है? हिंदी फैली दूर तलक ईर्ष्या -द्वेष क्यों नाहक इसका अपना इतिहास पुरातन पूजता रहता इसको जन-मन विस्मित सारा परिवेश है। हिंदी ने किसी से बैर न माना जो आया उसे अपना जाना सबको भाई-बंधू जानती रंग-रूप का भेद न मानती इसकी विशेषता ये विशेष है। हिंदी से कैसा द्वेष है? — केशव मोहन…

"हिंदी से कैसा द्वेष?"

मेरे बाबूजी

खंभा दीवार नींव थे घर के मेरे बाबूजी रूप थे हुनर के। उनमे थी सबको मिलाने की चाहत मरी धरती को जीलाने की चाहत दीदी की आशा भैया की उम्मीदें अम्मा की सजने-सजाने की चाहत, भीतर मोम मगर बाहर पत्थर थे।। गिनते न पैसा अतिथि के सम्मान में बड़ा सा मन था उस पतली सी जान में चाहता रहा मैं उन्हें जान पाऊँ पर कैसे घूमूँ पूरे आसमान में आधा साहस, आधा मेरा डर थे।।…

"मेरे बाबूजी"

वर्षों बाद भी ….

टूटते  हैं कई धागे नेह के हो के तार-तार। वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से तू ही मेरा घर-द्वार। स्मृति तेरे दीप्त नयन की हर क्षण उद्वेलित कर जाती सच कहता सौगंध तेरी तू पल में विपदा हर जाती तूने सजा दी मेरी दुनिया चहूँ ओर बरसे प्यार। वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से तू ही मेरा घर-द्वार। बंजर मन को स्नेह -उर्मि से सरस-सरल कर डाले तुम मीत! मिताई की मरहम से दूर किए…

"वर्षों बाद भी …."

हे माँ शारदे!

हे माँ शारदे! एक वर दे तू। अंध हृदय में ज्योति कर दे तू।। अगम अगोचर महिमा तेरी मैं खल कामी दुःख की ढेरी देरी करो ना विद्या दायिनी दुःख दरद सारी दर दे तू।। अमल कमल सा मेरा मन हो सहज सदाचारी जीवन हो मन हो कभी कलुष से आकुल कलुष सदा मेरा हर दे तू।। रस-छंद-बंधन मैं नहीं जानूँ तेरे समक्ष माता जिद्द ठानूं मानूँ कि कुछ अच्छा लिख लूँगा कल्पना का अक्षय…

"हे माँ शारदे!"

भारत देश महान

जिसके कण-कण बसा हुआ है ऋषि-मुनियों का ज्ञान वह है भारत देश महान वह है अपना देश महान। जड़-जंगम की महिमा न्यारी पूजी जाती हैं नदियाँ सारी पादप-पुहुप में प्रभु बसते हैं पाहन की प्रभुता है भारी जिसकी रक्षा में जन्मे यहाँ अनगिनत भगवान वह है भारत देश महान वह है अपना देश महान। भले उष्णता से तप्त धरा हो आसमान धरती पे गिरा हो ठण्ड गलाये अस्थि-पंजर को उदधि लाख लहरों से भरा हो…

"भारत देश महान"

मोहे दरश करा दो मोहन

मोहे दरश करा दो मोहन। निज प्रतिबिम्ब दिखा दो प्यारे, मेरे मन के मुकुरन।। मोहे दरश करा दो मोहन। मेरे मन के प्रेम लहर में अंग-अंग डूब जाये तुम ही कहो जग याद करूँ कैसे, जो तू ही रूठ जाये श्याम-सलोने सुरतिया पर, वारूँ शत-शत जीवन।। मोहे दरश करा दो मोहन। कर कृपा मुझपर हे मालिक एक दिन मेरी सुधि ले लो दया-दृष्टि देकर दुःख दर दो, ऐसे ना आस से खेलो दरश को तरसे…

"मोहे दरश करा दो मोहन"

देश का फ़ौजी

रोटी-सोटी, चाय-चपाती ये बड़े-बड़ों का खाना है, अपने लिए तो जल्दी से मैग्गी-सैगी बनवाना है। गार्डेन में जा कर मैं झूमूँ और झूला-झूलूँ खूब चॉकलेट-टॉफी ऐसे खाता कि नाक भी जाता डूब। मैं हूँ बच्चा, मन का सच्चा नहीं किसी से बैर। माँ-पापा की उँगली थाम के करना चाहूँ हरदम सैर। मम्मी का राजदुलारा हूँ सबके आँखों का तारा हूँ। सब कहते हैं जैसा भी हूँ मैं ही सबसे प्यारा हूँ। लाल-क़िले पर जाऊँगा मैं…

"देश का फ़ौजी"