तपन बिन सूरज हुआ अधीर

तपन बिन सूरज हुआ अधीर।। हवा बावली शीत लहर सी वसनहीन पर टूटी कहर सी अलाव ठोंके ताल खैनी का बनकर कुशासन का नज़ीर।। कथा कहता कौआ सच्चा ज़िद्द पर बैठा पूरब बच्चा रवि-फल का सब बाट अगोरे ओढ़े घने कोहरे का चीर।। साँस को रोके सिसके कुँआ साँस से निकले मुँह भर धुँआ मूली-मिर्च के सउना-गंध से दोपहरी बन बैठी गंभीर।। कारण बिन कोई कार्य न होए सांध्य-सुबह सब मिलकर रोए सद्भाव बने सब…

"तपन बिन सूरज हुआ अधीर"

मुबारक हो सबको नया साल

अधर पर रहे अक्षय मुस्कान नयन में चहक भरा हो बिहान रहे न अब कोई खस्ता हाल। मुबारक हो सबको नया साल।। रोटी हो सबको उपलब्ध हृदय सबका सबसे संबद्ध प्रीति की सरिता सभी बहायें सभी से विनती करूँ करबद्ध द्वेष हिंसा है नहीं निदान करें सब इसका मिल समाधान नहीं हो किसी से किसी को मलाल। मुबारक हो सबको नया साल।। ऊर्वरा बढ़े धरती का रोज सभी रहें उत्सुक देने को भोज हो कैसे…

"मुबारक हो सबको नया साल"

मन मेरे

मन मेरे चंचल मत होना।। स्वप्न अपरिमित है आँखों में नवल पुहुप पल्लव शाखों में लेकिन लक्ष्य कहीं कुछ दूर है जहाँ रेत में भरा है सोना।। कभी हार-थक सो नहीं जाऊँ भटक राह में खो नहीं जाऊँ हो नहीं जाऊँ कभी अकेला रिश्तों का अंबार है ढोना।। लक्ष्य निरंतर सहज न मिलते पुष्प-गुच्छ हरदम नहीं खिलते मिली हार तो जीतेगा भी तू बंद करो सब रोना-धोना।। *** केशव मोहन पाण्डेय

"मन मेरे"

मेरे गाँव की धरती

मेरे गाँव की धरती देती तरह-तरह के फूल।। कुछ हैं लंबे, कुछ हैं नाटे सोंधी मिट्टी से खुशबू बाँटे हरे पत्ते में कुछ हैं नीले रंग-रंगीले बैजनी सजीले मोटी-पतली पंखुड़ी वाले कुछ में हैं तीखे शूल। मेरे गाँव की धरती देती तरह-तरह के फूल।। फूल सुहाने अनुबंध लिए हैं छोटे हैं पर सुगंध लिए हैं इतराते हैं डाल-डाल पर अच्छे बूरे सभी हाल पर फैले खेत में दूर तलक हैं मन मोहते समूल। मेरे गाँव…

"मेरे गाँव की धरती"

जनम लिहले कन्हैया

जनम लिहले कन्हैया कि बाजेला बधाईया अँगनवा-दुअरिया नू हो। अरे माई, दुआरा पर नाचेला पँवरिया कि अइले दुखहरिया नू हो।। बिहसे ला सकल जहान कि अइले भगवान कि होई अब बिहान नू हो। अरे माई, हियरा में असरा बा जागल झुमेला नगरिया नू हो।। गरजि-चमकि मेघ बरसेले दरस के तरसेले मनवा में हरसे नू हो। अरे माई, जुग-जुग जियें नंदलाल कि आँखि के पुतरिया नू हो।। देखि के जमुना धधा गइली अउरी अगरा गइली कान्ह…

"जनम लिहले कन्हैया"