आतंक को धिक्कार

मुझमें जितनी असभ्यता है उससे भी नीचे जाकर मैं गाली देता हूँ उन बर्बर कृत्यों को जो आतंक से अभिहित हैं। मुझमें जीतनी भी जैसी भी सच्चाई है आज सच्चे मन ने उन्हें बटोर कर मैं श्राप देता हूँ उन नास्तिक विचारों को जो मानवता के शत्रु हैं। मुझे जो संस्कार दिए हैं माँ ने पिता ने जैसे सँवारा है मैं वह सब कुछ उड़ेल देना चाहता हूँ उन असामाजिक तत्त्वों में जो इसी समाज…

"आतंक को धिक्कार"

हे पूजनीय पिता

मैंने धरा धाम को देखा आपके कारण अनुभव किया भावनाओं को अकारण ही मुस्कुराना देख कर दूसरे की ख़ुशी आसुओं को रोक न पाना अपनी आखों से देख कर पीड़ा दूसरों की सीखा मैंने रोटी के टुकड़े करना निवाला मुँह में डालने से पहले। आपसे ही सीखा है रिश्तों को बटोरना ज़िंदा रखना बाँध कर सजाना ज़िन्दगी के हर मोड़ पर गुनगुनाना मुस्कुराना और चल पड़ना ताल ठोंक कर ज़िन्दगी की राहों पर। आपसे ही…

"हे पूजनीय पिता"

जब तक साँस बाकी है

जब तक साँस बाकी है, तब तक आस बाकी है। अभी तक आँखों में कोई तुम सा खास बाकी है। मिलना और बिछड़ना है अपने लिए एक गाली सी रहेंगे साथ में हरदम हम यह विश्वास बाकी है।। ———– केशव मोहन पाण्डेय ———- सर्वश्री रक्षित अरविंदराय दवे द्वारा गुजराती में अनुदित જ્યાં સુધી શ્વસે છે શ્વાસ, શેષ છે ત્યાં સુધી આશ, આંખોમાં અત્યાર સુધી તુજ સમું સમાયું છે ખાસ. મળવું અને થવું અલગ છે આપણ…

"जब तक साँस बाकी है"