उनके जैसा जगत में

सुख में दुःख में जो सदा, रखते रहते टेव। आते उनके रूप में, धरा-धाम पर देव।। नफ़रत हैं जो घोलते, दो लोगों के बीच। उनके जैसा जगत में, नहिं है कोई नीच।। मधुर-मधुर सी बात कर, चलते टेढ़ी चाल। उनके जैसा जगत में, नहिं कोई कंगाल।। बीच सभा में दे नहीं, जो खुद को सम्मान। उनके जैसा जगत में, नहीं अधम इनसान।। ** केशव मोहन पाण्डेय

"उनके जैसा जगत में"

मनचाहा मित्र

बाँध मत किसी बाँध से, रोक न मेरी धार। समय कभी सहला ज़रा, कर कठोर प्रहार।।1 जब हो जाता है कभी, भावों का अनुबंध। अजनबी से भी जुड़ता, जन्मों का संबंध।।2 चाहे करना और कुछ, हो जाता कुछ और। मानव जीवन में चला, जब भी गड़बड़ दौर।।3 जीवन बन जाता सदा, सुखद सुगंधित इत्र। मिल जाता सौभाग्य से, जो मनचाहा मित्र।।4 मेरी साँसें तुम बनो, तेरी मैं प्रतिश्वास। मेरी धड़कन जब रुके, तुमको हो आभास।।5…

"मनचाहा मित्र"

तेरे-मेरे बीच में

तेरे-मेरे बीच में, ऐसा हो विश्वास। होकर दूर एक लगें, जैसे भू-आकाश।।1 तेरे-मेरे बीच में, रिश्तों की है गाँठ। अपनी-अपनी आँख से, दुनिया पढ़ती पाठ।।2 सपने आँखों में लिए, धरती पर हो पाँव। बसता उसके मन सदा, खुशियों वाला गाँव।।3 चलते रहना काम है, है आराम हराम। बनते चलने से सदा, सारे बिगड़े काम।।4 सुन्दर सारा जगत है, सुन्दर शशि-दिनमान। सबसे सुन्दर मनुज है, सकल गुणों की खान।।5 ——— – केशव मोहन पाण्डेय

"तेरे-मेरे बीच में"

कैसे-कैसे लोग हैं

कैसे-कैसे लोग हैं, कैसी उनकी बात। सौंपे कोई सब यहाँ, कोई करता घात।।1 सारी दुनिया ढूँढती, खुशियों का अम्बार। सारी दुनिया भूलती, अपना ही घर-बार।।2 फैला सारे जगत में, छल-छद्म-व्यभिचार। लगता सारे जगत में, संजीवन सा प्यार।।3 संबंधों के दीप में, हो यह दिव्य प्रकाश। अँधियारा छल का मिटे, विकसित हो विश्वास।।4 संबंधों की भीड़ से, अच्छे हैं दो-चार। वैसे तो सारा जगत, है अपना परिवार।।5 ——— – केशव मोहन पाण्डेय

"कैसे-कैसे लोग हैं"

झूले पड़े फुहार के

झूले पड़े फुहार के, बादल दल के बाग। कजरी कोयल गा रही, बढ़ा रही अनुराग।।1 धरती धानी हो गई, सावन का पा प्यार। प्रियतम अंबर कर रहे, बार-बार मनुहार।।2 सावन सुख की गागरी, धन का ले भण्डार। लहराती वर्षा लिए, आया धरती द्वार।।3 सावन आने से बने, जीवन सुख-सौगात। सुभग सलोना दिन लगे, रसिक हो गई रात।।4 धरती विहसी देख के, सावन लगा फुहार। सुखद हो गई जिंदगी, पाकर माँ का प्यार।।5 —— – केशव…

"झूले पड़े फुहार के"

सुन्दर दिन-रात

फूल फूल सुन्दर लगे, सुन्दर डाल व पात। मन में खुशियाँ हो भरी, तो सुन्दर दिन-रात।। 1 ठहरे जल का मोल क्या, बहता पाये मान। चलने वाले का सदा, होता रहा जहान।। 2 पत्थर गिरा पहाड़ से, तेज नुकीला रूप। घिसते-घिसते हो चला, चिकना चारु स्वरुप।।3 एक पत्र का मोल क्या, जो अलग तना, शाख। अलग-अलग जो हो गए, मिल जाते सब राख।।4 पादप पंखुड़ी पुहुप, प्रीति रीति अनमोल। मौन-मौन ही गंध दे, बोले न…

"सुन्दर दिन-रात"