प्रकृति के परिवर्तन का पर्व मकर-संक्रांति

खिचड़ी खाने में कभी पेट को हानि नहीं उठाना पड़ता है। इससे हल्का भोजन शायद ही कुछ हो। यह एक लोकप्रिय भारतीय व्यंजन है जो दाल तथा चावल को एक साथ उबाल कर तैयार किया जाता है। इसमें हमारी माई स्वादानुसार और आइटम भी डालती थीं। यह पेट के रोगियों के लिये विशेष रूप से उपयोगी है। यह तो इसका पाचकीय और औषधीय गुण हुआ, मगर भारतीय समाज की विराटता की दृष्टि से देखा जाय तो यह एक पर्व विशेष का पकवान विशेष भी है। उस दिन छप्पन भोग इसके सामने मात खा जाते हैं।
उत्तरी भारत में मकर संक्रान्ति के पर्व को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाने का विशेष रूप से प्रचलन है। वैसे गाहे-बेगाहे लोग पता नहीं किस-किस प्रकार का खिचड़ी पकाते है, यह तो राजनीति, कूटनीति, पारिवारिक ढाँचा, सामाजिक सोच और वैश्विक संबंधों के साथ भी सिद्ध किया जा सकता है। मगर जब बात मकर संक्रांति के दिन की हो तो उस दिन लोग खिचड़ी बनाते हैं और सूर्य देव को खिचड़ी प्रसाद स्वरूप अर्पित करते हैं। सूर्य देव भी इस दिन भक्तों से प्राप्त खिचड़ी का स्वाद बड़े आनंद से लेते हैं। आखिर ऐसा क्यों न हो? इस दिन खिचड़ी बनाने और इसे ही प्रसाद स्वरूप देवाताओं को अर्पित करने की परंपरा शुरू करने वाले भगवान शिव जो माने जाते हैं। साल भर में आपने भले ही कितनी ही बार खिचड़ी खायी हो लेकिन मकर संक्रांति जैसी खिचड़ी का स्वाद आपको सिर्फ मकर संक्रांति के मौके पर ही मिल सकता है।
     इन पर्वों-त्योहारों का सबसे सुखद आनन्द बचपन में आता है। बाद में तो वे सुखद पल केवल स्मृतियों में ही रह जाते हैं। समय का बवण्डर जीवन जीने के लिए पता नहीं आदमी को किस-किस घाट का दर्शन करवाता है, यह तो भोगने वाला भी नहीं याद कर पाता। जब इन पर्व-त्याहारों का अवसर आता है तो बीती स्मृतियों के दर्पण का गर्त कुछ-कुछ उड़ने लगता है और चित्र में स्वच्छता आने लगती है। मुझे अपने बचपन की खिचड़ी जिसे मकर संक्रांति भी कहा जाता है, वह कई कारणों से याद आती है। नहाने, खाने और पहनने तक के कारण। भले जाड़े के कारण और दिन न नहाने का मन करे, मगर मकर संक्रांति के आले सुबह नींद खुल जाती थी। पानी गरम है या नहीं, बाबुजी के लाख डाँट और माई के नौ निहोरा के पहले ही नहाने का मूड बन जाता था। नहाये कि माई पतुकी (मिट्टी का छोटा बरतन) में चावल, बैगन, चावल का लड्डू (लाईध्धोंधा), तील का लड्डू, आलू, मिर्च, नमक आदि छूने के लिए रख देती थीं। हम लपक कर वहीं पहुँचते थे। छू कर चढ़ाये गए खिचड़ी के चावल की बनी गरमागरम खिचड़ी खाते और फिर खेत से तोड़कर लायी गई गोभी तथा नकिया कर लाये गये आलू की गरमागरम सब्जी के साथ लाई का स्वाद कैसे बिसारा जा सकता है। यह तो बचपन में खिचड़ी के दिन भोगे गए यथार्थ का चित्र  है, मगर इस खिचड़ी या मकर संक्रांति की सामाजिक मान्यता और लोक स्वीकृति भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
     मान्यता है कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा की शुरूआत हुई। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। खिचड़ी बनने की परंपरा को शुरू करने वाले बाबा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) थे। बाबा गोरखनाथ को भगवान शिव का अंश भी माना जाता है। कथा है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था। इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमजोर हो रहे थे। इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था। इससे शरीर को तुरंत उर्जा भी मिलती थी। नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। झटपट बनने वाली खिचड़ी से नाथयोगियों की भोजन की समस्या का समाधान हो गया और खिलजी के आतंक को दूर करने में वह सफल रहे। खिलजी से मुक्ति मिलने के कारण गोरखपुर में मकर संक्रांति को विजय दर्शन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। गोरखपुर स्थिति बाबा गोरखनाथ के मंदिर के पास मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेला आरंभ होता है। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और इसे ही प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।
     शास्त्रानुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, जो सूर्य देव के पुत्र होते हुए भी सूर्य से शत्रु भाव रखते हैं। अतः शनिदेव के घर में सूर्य की उपस्थिति के दौरान शनि उन्हें कष्ट न दें, इसलिए तिल का दान और सेवन मकर संक्रांति में किया जाता है। मान्यता यह भी है कि माघ मास में जो व्यक्ति रोजाना भगवान विष्णु की पूजा तिल से करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। मान्यता भी है कि इस दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते हैं। इसलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्त्व है। इस दिन गंगा स्नान करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इस आधार पर हम मकर-संक्रांति को प्रकृति के परिवर्तन का पर्व कह सकते हैं।
     मकर संक्रांति में चावल, गुड़, उड़द, तिल आदि चीजों को खाने में शामिल किया जाता है, क्योंकि यह पौष्टिक होने के साथ ही शरीर को गर्म रखने वाले होते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को अनाज, वस्त्र, ऊनी कपड़े, फल आदि दान करने से शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। दीर्घायु एवं निरोगी रहने के लिए रोगी को इस दिन औषधि, तेल, आहार दान करना चाहिए। सूर्यदेव के उत्तरायण की राशि मकर में प्रवेश करने के साथ ही देवताओं के दिन और पितरों की रात्रि का शुभारंभ हो जाएगा। इसके साथ सभी तरह के मांगलिक कार्य, यज्ञोपवीत, शादी-विवाह, गृहप्रवेश आदि आरंभ हो जाएंगे। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश पृथ्वी वासियों के लिए वरदान की तरह है। कहा जाता है कि सभी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व, नाग, किन्नर आदि इस अवधि के मध्य तीर्थराज प्रयाग में एकत्रित होकर संगम तट पर स्नान करते हैं। श्री तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है कि –
‘माघ मकर रबिगत जब होई।
तीरथपति आवहिं सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेंणी।
सादर मज्जहिं सकल त्रिवेंणी।।’
     अब यह तो स्पष्ट है कि मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर सभी तीर्थों के राजा प्रयाग के पावन संगम तट पर महीने भर वास करते हुए स्नान ध्यान दान पुण्य करने का विधा है मगर बाबा गोरक्षनाथ के मंदिर में उस अवसर पर खिचड़ी चढ़ाने का भी कम महत्त्व नहीं है। ये परम्पराएँ, ये लोक मान्यताएँ, ये सामाजिक आयोजन कभी हमें गुड़ के माधुर्य से तील जैसे बिखरे समाज को एक सूत्र में बाँधने का उदाहरण देते हैं तो कभी मिट्टी की पतुकी और नदिया की खरीददारी से सामाजिक व्यवसाय को सम्मानित करते हैं। वैसे तो धर्म की परिपाटी तो यह है कि प्राणी इस माह में किसी भी तीर्थ, नदी और समुद्र में स्नान कर दान-पुण्य करके त्रिबिध तापों से मुक्ति पा सकता है, लेकिन लोक-मान्यता और व्यावहारिकता का मग भी समाज में एकता और माधुर्य को कायम रखने का एक प्रयोग है।
     बचपन की बाते अनायास ही नहीं याद आतीं। जब जीवन के रास्ते पर अनुभवों का उपहार और ठोकरें मिलती हैं तो बच्चे के भविष्य की कल्पना वाली बातें याद आ जाती हैं। याद आ जाता है कदम-कदम पर बड़े-बुजुर्गों का समझाना और हमारा मौन प्रतिकार करना। याद आ जाता है खिचड़ी के बाद पुराने पतुकी से दिदियों के साथ गोनसार का खेल खेलना और संझा के खेल के बाद, तुलसी पुरवा पर दीया रखा जाने के पहले एक गाल लाई (तील या चावल का लड्डू) खाने की जिद्द करना। तब एक बार फिर दीदी-भैया के साथ थाल में आगे आये खिचड़ी को देखकर मन गा ही उठता है –
‘खिचड़ी के खींचखाँच, फगुआ के बरी।
नवमी के नौ रोटी, तब पेट भरी।।’

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