मैं डरता हूँ

यह सत्य है मैं डरता हूँ। मैं डरता हूँ कि रिश्ते टूट न जाएँ अपने छूट न जाएँ सिर्फ इसीलिए आइना नहीं दिखता अतार्किक या तार्किक ज्ञान की बातें नहीं समझाता हाँ, स्वयं तो रोज आइना देखता हूँ और प्रयास करता हूँ अपना रूप सँवारने का जीतने का भी और प्रसन्नता से हारने का। मेरे लिए कई बार महत्त्वहीन हो जाता है बाजी मार जाना कई बार समझ में आता है आदमीयत का सही अर्थ…

"मैं डरता हूँ"

मेरे लिए खास हरदम हो

मेरा आभास हरदम ही, मेरे लिए खास हरदम हो हवाओं में फ़िज़ाओं में अलग एहसास हरदम हो ज़िन्दगी में बँधी है डोर जबसे अपने ज़ज़्बातों की तुम मेरी साँस हरदम हो, मेरा विश्वास हरदम हो। ***** केशव मोहन पाण्डेय *****

"मेरे लिए खास हरदम हो"

सीढ़ी

आदमी मंजिल तक सीढ़ियों से जाता है , सीढ़ी साधन हैं लक्ष्य प्राप्ति का, मगर स्वयं करना है कदम उठाने का उद्यम जाने के लिए मंजिल तक। ——- – केशव मोहन पाण्डेय

"सीढ़ी"

पाषाण-खंड

अचल से टूटा पाषाण बेहद खुरदुरा नुकीला और बेढब होता है नहीं रुचता आँखों को चुभता है पाँवों में रोड़ा होता है रास्ते का। समय की मार से बहकर अनुभव की धारा में रगड़ खाकर सत्यता के दो पाटों बीच बेहद खुरदुरा नुकीला और बेढब पाषाण-खंड चिकना हो जाता है आँखों को पाँवों को खूब भाता है और सजाता है रास्ते को। ** केशव मोहन पाण्डेय **

"पाषाण-खंड"

जड़

मेरे भीतर बहती है एक नदी तुम्हें देखकर तरल भावों की कलकल निर्मल निरंतर और तुम हमेशा ही मौन होकर जड़ बना देती हो। ***** – केशव मोहन पाण्डेय

"जड़"

प्रेम

तुम्हारे स्वर में जब सुनता हूँ परिभाषा प्रेम की तब आँखें तरल हो जाती हैं कान सघन और जबड़े जैसे पत्थर के मैं भी तो हो जाता हूँ मूर्तिवत किंकर्तव्यविमूढ़ होकर। ***** – केशव मोहन पाण्डेय

"प्रेम"

मानसरोवर

समय क्या पूछना आलिंगनबद्ध युगल से प्रश्न कैसा जीवन की आपाधापी का प्रेम में निबद्ध होने पर एकात्म होने से कहाँ अवकाश है दुनियावी प्रपंचों के लिए। पर अगर अधूरा है विश्वास तब निश्चय ही अस्तित्व-शून्य है प्यार परिभाषा उसकी और पावनता मानसरोवर की किसी के देवत्व के लिए। ***** – केशव मोहन पाण्डेय

"मानसरोवर"

वर्षों बाद भी ….

टूटते  हैं कई धागे नेह के हो के तार-तार। वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से तू ही मेरा घर-द्वार। स्मृति तेरे दीप्त नयन की हर क्षण उद्वेलित कर जाती सच कहता सौगंध तेरी तू पल में विपदा हर जाती तूने सजा दी मेरी दुनिया चहूँ ओर बरसे प्यार। वर्षों बाद भी प्रिये हृदय से तू ही मेरा घर-द्वार। बंजर मन को स्नेह -उर्मि से सरस-सरल कर डाले तुम मीत! मिताई की मरहम से दूर किए…

"वर्षों बाद भी …."

परवरिश

एक सामान्य परिवार से होकर भी उद्भव जी ने अपने कर्मों से खूब नाम, यश, प्रतिष्ठा कमायी। क्षेत्र क्या, पूरे मंडल में कोई सामाजिक, साहित्यिक या बौद्धिक कार्य हो रहा हो, तो उसमें उद्भव जी निश्चित ही रहते हैं। उनकी महति भूमिका भी होती है। उद्भव जी ने शहर में रहकर बेटे प्रेम और बेटी प्रभा को उच्च शिक्षा दी। बेटी को एक एन आर आई इंजीनियर से व्याह दिया। अब बेटी भी अमेरिका में…

"परवरिश"