भोजपुरी लोकगीतों में नारी की प्रासंगिकता

भारतीय संस्कृति में पूरी तरह से विविधता देखी जाती है। यह विविधता भोजपुरी की विशिष्टता बन जाती है। अलग पहचान बन जाती है। यहीं विविधता तो इस संस्कृति की विशिष्टता है। इसे किसी निश्चित ढ़ाँचे में नहीं गढ़ा जा सकता। इस बलखाती अल्हड़ नदी को किसी बाँध से नहीं घेरा जा सकता। यह तो उस वसंती हवा सी स्वतंत्र है जो अपनी ही मानती है। इसे किसी दिशा-निर्देश का अर्थ नहीं पता। इसका कोई गुरू…

"भोजपुरी लोकगीतों में नारी की प्रासंगिकता"

कृषि-कार्यों से प्रेरित है नागपंचमी

    जब भी कोई पर्व-त्योहार, पूजा-पाठ का अवसर आता है तो मुझे बचपन की यादें आने लगती हैं। सावन में माँ की याद आते ही बिल्व-पत्र पर चंदन के लेप से राम-राम लिखकर शिव जी की पूजा करना, सावनी सोमवार का व्रत और फिर श्रावणी शुक्लपक्ष की पंचमी को नामपंचमी। नागपंचमी का कुछ अलग ही उत्साह होता था तब। सुबह ही गाय के गोबर और पीले सरसों से घर के चारों ओर घेरा बनाया…

"कृषि-कार्यों से प्रेरित है नागपंचमी"

वो जो छोर देख रहे हो

वो जो छोर देख रहे हो वही मिलती है धरती आकाश से वही सपने सच होते है और हक़ीक़त गलबाँही करती है सपनों को। वो जो छोर देख रहे हो वही है ढेरों सफलताएँ परंतु वहाँ जाने के लिए पार करना पड़ता है समय के पहाड़ को गुजरना पड़ता है यथार्थ के जंगल से अनुभव के दुर्गम रास्ते से होकर कई बार तो निरंतरता की सपाट जमीन मिल जाती है और कई बार चुनौती देती…

"वो जो छोर देख रहे हो"

बार-बार ढूँढता हूँ

माँ पैबंद जोड़ती थी रिश्तों में पिता अनुबंध जीते थे किश्तों में और दोनों मिलकर सपनों को पालते रहे सिंचते रहे सजोते रहे और जीवंत करने के लिए सपने मारते रहे मन पालते रहे संतति-धन। माँ जीवन-पर्यन्त आस पिरोती रही आँखों का मोती संभाल कर साँसों के धागे में ले उम्मीदों की सुई और जीती रही बन के छुईमुई। पिता संस्कार बोते थे समरसता की जमीन पर निष्ठा की कुदाल से काट-काट बोझिल कुंठा को।…

"बार-बार ढूँढता हूँ"

मन मेरे

मन मेरे चंचल मत होना।। स्वप्न अपरिमित है आँखों में नवल पुहुप पल्लव शाखों में लेकिन लक्ष्य कहीं कुछ दूर है जहाँ रेत में भरा है सोना।। कभी हार-थक सो नहीं जाऊँ भटक राह में खो नहीं जाऊँ हो नहीं जाऊँ कभी अकेला रिश्तों का अंबार है ढोना।। लक्ष्य निरंतर सहज न मिलते पुष्प-गुच्छ हरदम नहीं खिलते मिली हार तो जीतेगा भी तू बंद करो सब रोना-धोना।। *** केशव मोहन पाण्डेय

"मन मेरे"

हर रूप में आकर्षक है अपना भारत 

हमारे प्यारे भारत के कई रूप हैं। सृष्टि के सृजन से लेकर प्रथम मानव के साथ गतिशील भारत अनेक रूपों में नजर आता है। आततायियों-आक्रांताओं को सहन करता, लड़ता, उन्हें अपना बनाता और सुदूर भगाता भारत कहीं रूकता नजर नहीं आता है। आज के भारत का सर्वाधिक परिस्कृत रूप 15 अगस्त 1947 को दिखा। उस दिन भारत-भूमि को चार-चाँद लग गया। तब से आज तक का भारत विश्व समुदाय में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा…

"हर रूप में आकर्षक है अपना भारत "

मेरे गाँव की धरती

मेरे गाँव की धरती देती तरह-तरह के फूल।। कुछ हैं लंबे, कुछ हैं नाटे सोंधी मिट्टी से खुशबू बाँटे हरे पत्ते में कुछ हैं नीले रंग-रंगीले बैजनी सजीले मोटी-पतली पंखुड़ी वाले कुछ में हैं तीखे शूल। मेरे गाँव की धरती देती तरह-तरह के फूल।। फूल सुहाने अनुबंध लिए हैं छोटे हैं पर सुगंध लिए हैं इतराते हैं डाल-डाल पर अच्छे बूरे सभी हाल पर फैले खेत में दूर तलक हैं मन मोहते समूल। मेरे गाँव…

"मेरे गाँव की धरती"

संभवामि युगे-युगे

भगवान श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुष लीला अवतार कहा गया है। उनका लीलामय जीवन अनके प्रेरणाओं व मार्गदर्शन से भरा हुआ है। उनकी दिव्य लीलाओं का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तार से किया गया है। उनका चरित्र मानव को धर्म, प्रेम, करुणा, ज्ञान, त्याग, साहस व कर्तव्य के प्रति प्रेरित करता है। उनकी भक्ति मानव को जीवन की पूर्णता की ओर ले जाती है। भाद्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को चारों ओर कृष्ण जन्म को उत्सव…

"संभवामि युगे-युगे"

अगर मन तेरा पावन हो

मेरी माँ रोज कहती थी, जो अब जज्बात में रहती। अगर मन तेरा पावन हो तो गंगा परात में रहती। संभल के बोलना लल्ला, बड़ी ताक़त है बोली में – गरल तो भर गया सबमें है सुधा भी बात में रहती।। ————- – केशव मोहन पाण्डेय

"अगर मन तेरा पावन हो"

मैं मरा नहीं हूँ

मुझे विश्वास है मैं मरा नहीं हूँ और मरूँगा भी नहीं ये अलग बात है कि कीचड़ के किनारे खड़ा होकर पत्थर नहीं मरूँगा कीचड़ में उसमे उगते कमल को दूर से ही प्रणाम करूँगा होता है तो हो जाए पथांतर मैं मरूँगा नहीं, अपना काम करूँगा। जी हाँ, मुझे रिश्ते नहीं चाहिए मेरा पीठ थपथपाने के लिए परंतु नहीं रहूँगा साथ तुम्हारे केवल शोषित होने के लिए भी। मुझे घृणा है तुमसे तुम्हारे व्यापार…

"मैं मरा नहीं हूँ"