हिन्दी में आदिवासी लेखन का परिदृश्य

संस्कृत के काव्यशास्त्रीय प्रतिमानों से होते हुए मुक्त छंद में रच बस चुकी हिन्दी कविता आज भी अपने कला-रूप  को लंेकर सजग है। आज भी दलित लेखकों की प्रभावी कविता को वह जगह नहीं मिली जिसकी वह हकदार है। बिम्ब, प्रतीक, वाग्मिता, छंद-लय की माँग आज भी हिन्दी  कविता में अपेक्षित है। किन्तु हिन्दी के वर्तमान पर विमर्शात्मक विविध स्वरों की दस्तक हो चुकी है। दलित चिंतन को आधार बनाकर लिखने वाले कवियों ने स्वतंत्रता,…

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